दीपावली पर पूरा देश रोशनी से जगमगा उठता है। घर सजते हैं, बाजार चमकते हैं और खुशियों के संदेश बांटे जाते हैं। लेकिन इस जगमगाहट के बीच एक सवाल अनुत्तरित है कि क्या प्रकाश की यह चमक हर घर तक पहुंची है? क्या महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और आर्थिक विषमता से जूझते करोड़ों लोगों के जीवन से भी अंधेरा मिटा है? यदि गरीब के घर में चूल्हा जलाना मुश्किल हो और युवा रोजगार के लिए भटक रहा हो, तो उत्सव की खुशियां आखिर कितनी सार्थक हैं?
देश में विकास के बड़े-बड़े दावे हैं। स्मार्ट सिटी, एक्सप्रेस-वे, ऊंची इमारतें और विशाल परियोजनाएं प्रगति की तस्वीर पेश करती हैं, लेकिन आम आदमी की जिंदगी की हकीकत कुछ और है। महंगाई ने घरेलू बजट बिगाड़ दिया है। शिक्षा और इलाज महंगे होते जा रहे हैं। किसान अपनी उपज का उचित मूल्य पाने के लिए संघर्षरत है और नौजवानों के सामने रोजगार का संकट है। विकास का पैमाना केवल आंकड़े और निर्माण परियोजनाएं नहीं, बल्कि नागरिकों के जीवन में आया बदलाव होना चाहिए। सबसे गंभीर चिंता व्यवस्था के नैतिक पतन की है। भ्रष्टाचार और बेईमानी का संकट अब केवल सरकारी दफ्तरों तक सीमित नहीं है। सत्ता और नीति-निर्धारण से जुड़ी संस्थाओं की कार्यशैली पर भी सवाल उठ रहे हैं। जिन लोगों पर संविधान की मूल भावना, नागरिक अधिकारों और लोकतांत्रिक मर्यादाओं की रक्षा का दायित्व है, उन्हीं की जवाबदेही पर प्रश्नचिह्न लगना चिंताजनक है। लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने और सत्ता चलाने का नाम नहीं, बल्कि पारदर्शिता, निष्पक्षता और जनता के प्रति जवाबदेही का नाम है। सरकारें अयोध्या में राम मंदिर निर्माण, अनुच्छेद 370 की समाप्ति, धार्मिक स्थलों के विकास और बड़ी बुनियादी परियोजनाओं को उपलब्धियों के रूप में गिनाती हैं। इनका महत्व अपनी जगह है, लेकिन आम आदमी के बुनियादी सवालों की अनदेखी नहीं की जा सकती। रामराज्य की कल्पना भव्य निर्माणों से आगे न्यायपूर्ण शासन, भयमुक्त समाज और भूख से मुक्ति में साकार होती है। गरीब को रोटी, युवा को रोजगार और हर नागरिक को सस्ता इलाज व गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिलना ही विकास की असली कसौटी है।
धर्म और जाति के नाम पर बढ़ती नफरत तथा असहमति के प्रति असहिष्णुता भी लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय है। धर्म का काम समाज को जोड़ना है, बांटना नहीं। सवाल पूछना नागरिक का अधिकार है और सत्ता की जवाबदेही लोकतंत्र की अनिवार्य शर्त। दीपावली का संदेश केवल घरों का अंधेरा मिटाना नहीं, बल्कि समाज और व्यवस्था की विसंगतियों को दूर करना भी है। सरकारों को आत्ममंथन करना होगा और संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता सुनिश्चित करनी होगी। सत्ता को समझना होगा कि कुर्सी विशेषाधिकार नहीं, जनता के प्रति जिम्मेदारी है। दीपावली तभी सार्थक होगी, जब गरीब भूखा नहीं सोएगा, युवा रोजगार के लिए नहीं भटकेगा, न्याय के लिए आम आदमी को दर-दर नहीं भटकना पड़ेगा और संविधान का प्रकाश समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचेगा। केवल घरों में नहीं, व्यवस्था में भी उजाला होना चाहिए।
-मिलिंद ठाकरे

