दिल्ली। भारत के कॉर्पोरेट और बैंकिंग सेक्टर से जुड़ा एक बड़ा कानूनी अपडेट सामने आया है, जहां अनिल अंबानी को सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिली। कोर्ट ने उनकी उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने अपने लोन खातों को “फ्रॉड” घोषित किए जाने पर रोक लगाने की मांग की थी। इस फैसले के बाद अब मामला और गंभीर मोड़ पर पहुंच गया है।
क्या है पूरा मामला?
दरअसल, यह विवाद उन बैंकों से जुड़ा है, जिन्होंने अंबानी के खातों को Reserve Bank of India के 2024 के मास्टर डायरेक्शन के तहत “फ्रॉड” कैटेगरी में डाल दिया था। इन बैंकों में Bank of Baroda, Indian Overseas Bank और IDBI Bank शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि Bombay High Court की डिवीजन बेंच के आदेश में दखल देने का कोई ठोस आधार नहीं है। हाईकोर्ट पहले ही अंबानी को मिली अंतरिम राहत (स्टे) हटा चुका था।
कोर्ट की सख्त टिप्पणी और निर्देश
सुनवाई के दौरान सूर्यकान्त की अध्यक्षता वाली बेंच ने यह भी संकेत दिया कि मामला “फंड डायवर्जन” यानी पैसों के कथित गलत इस्तेमाल से जुड़ा है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि- हाईकोर्ट की टिप्पणियां अंतिम फैसले को प्रभावित नहीं करेंगी। निचली अदालत को केस की सुनवाई तेजी से पूरी करने के निर्देश दिए गए हैं। यह इशारा करता है कि आने वाले समय में इस केस में और बड़े खुलासे हो सकते हैं।
कोर्ट में क्या हुई बहस?
बता दें अंबानी की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने दलील दी कि “फ्रॉड” घोषित किया जाना उनके लिए “सिविल डेथ” जैसा है और बिना उचित ऑडिट के यह फैसला लिया गया है। वहीं सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इन दलीलों का कड़ा विरोध किया और कहा कि ऑडिट रिपोर्ट “चौंकाने वाली और पूरी तरह वैध” है।
कोर्ट ने रखा तटस्थ रुख
सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल ने यह भी कहा कि उनके मुवक्किल बैंकों के साथ समझौते के लिए तैयार हैं। हालांकि, तुषार मेहता ने इस पर आपत्ति जताई और कहा कि इस बयान के कानूनी प्रभाव हो सकते हैं। साथ ही कोर्ट ने इस बयान को रिकॉर्ड में लिया, लेकिन इस पर कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।

