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महामहिम बोले, हमें आदिवासी डांस नहीं, विकास चाहिए..!

मध्यप्रदेश के राज्यपाल मंगूभाई पटेल की हालिया टिप्पणी एक औपचारिक नाराजगी नहीं, अपितु सिस्टम की खामियों पर सीधा और गहरा प्रहार है। जब वे यह सवाल उठाते हैं कि क्या आदिवासी बच्चों का काम सिर्फ कार्यक्रमों में डांस करना रह गया है? तो यह बयान व्यवस्था की संवेदनहीनता को उजागर करता है। प्रदेश में करीब 21 प्रतिशत आदिवासी आबादी है, लेकिन उनके हिस्से का बजट और योजनाएं कागजों में सिमट कर रह जाती हैं। जनजातीय योजनाओं के तहत मिलने वाली राशि का 22 प्रतिशत ( लगभग 299 करोड़ रुपये) का लैप्स हो जाना सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि विकास के अवसरों की हत्या है। यह पैसा केंद्र से आता है, खास उद्देश्य के लिए आता है, फिर भी उसका सही उपयोग नहीं होना चिंताजनक है। राज्यपाल का यह कहना कि जनजातीय महकमे से पूछा ही नहीं जाता कि पैसा कहां खर्च हो, शासन की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। क्या योजनाएं सिर्फ फाइलों में पूरी करने के लिए बन रही हैं? क्या जमीनी जरूरतों को समझने की कोशिश ही नहीं हो रही? कार्यक्रम में मौजूद मुख्यमंत्री मोहन यादव के सामने उठे ये सवाल सरकार के लिए आत्ममंथन का अवसर हैं।तेलंगाना और कर्नाटक जैसे राज्यों का उदाहरण देते हुए राज्यपाल ने साफ संकेत दिया कि जवाबदेही तय किए बिना बदलाव संभव नहीं। यह मुद्दा केवल बजट खर्च का नहीं, बल्कि सोच का है। जब तक जनजातीय समुदाय को दिखावे का हिस्सा समझा जाएगा, तब तक वास्तविक विकास अधूरा रहेगा। उन्हें मंच पर नाचने के लिए नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सम्मानजनक जीवन के अधिकार के लिए प्राथमिकता दी जानी चाहिए। आवश्यकता इस बात की है कि सरकार और प्रशासन अपनेपन की उस कमी को दूर करें, जिसकी ओर राज्यपाल ने इशारा किया है। योजनाएं समय पर लागू हों, बजट का सही उपयोग हो और सबसे अहम जनजातीय समाज की आवाज को सुना जाए। अगर यह चेतावनी भी अनसुनी रह गई, तो यह केवल एक समुदाय नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश के भविष्य के साथ अन्याय होगा।

-मिलिंद ठाकरे

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