मप्र सरकार द्वारा सोम डिस्टिलरीज समूह के आबकारी लाइसेंस नवीनीकरण आवेदन को निरस्त करना केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि सरकार की उस मंशा का संकेत है जिसमें कानून को प्रभाव और पहुंच से ऊपर रखने का प्रयास दिखाई देता है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के निर्देश पर हुई इस कार्रवाई ने उन सवालों को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया है, जो वर्षों से विभिन्न आरोपों और शिकायतों के बावजूद अनुत्तरित बने हुए थे।
आबकारी आयुक्त के आदेश में स्पष्ट किया गया है कि लाइसेंस का नवीनीकरण किसी भी संस्था का अधिकार नहीं, बल्कि एक सशर्त प्रशासनिक सुविधा है। यह सुविधा तभी दी जा सकती है जब संबंधित संस्था का आचरण, कानूनी अनुपालन और सार्वजनिक हित के प्रति उसका दायित्व निर्विवाद हो। ऐसे में यदि किसी उद्योग समूह का नाम अवैध शराब परिवहन, कूटरचित परमिटों के उपयोग, राजस्व हानि और आबकारी कानूनों के उल्लंघन जैसे मामलों से जुड़ता रहा हो, तो सरकार के लिए कठोर कदम उठाना स्वाभाविक हो जाता है।
इस पूरे प्रकरण का एक महत्वपूर्ण पक्ष पर्यावरण से भी जुड़ा हुआ है। लंबे समय से सामाजिक संगठनों, स्थानीय नागरिकों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं द्वारा औद्योगिक गतिविधियों के कारण जल स्रोतों और पर्यावरण को होने वाले नुकसान के आरोप लगाए जाते रहे हैं। हालांकि इन शिकायतों पर समय-समय पर कार्रवाई की बातें हुईं, लेकिन आम धारणा यही बनी रही कि प्रभावशाली उद्योगों को अक्सर विशेष संरक्षण प्राप्त रहता है। यही कारण है कि वर्तमान कार्रवाई को केवल एक कंपनी के खिलाफ कदम नहीं, बल्कि शासन की विश्वसनीयता की कसौटी के रूप में भी देखा जा रहा है। उद्योग किसी भी राज्य के विकास और रोजगार सृजन के लिए आवश्यक हैं, लेकिन विकास का अर्थ यह नहीं हो सकता कि पर्यावरणीय मानकों, कानूनी प्रक्रियाओं और सार्वजनिक हित की अनदेखी की जाए। यदि प्राकृतिक संसाधनों को नुकसान पहुंचता है या नियमों का उल्लंघन होता है, तो जवाबदेही तय होना लोकतांत्रिक शासन की अनिवार्य शर्त है। हालांकि सरकार का यह निर्णय स्वागत योग्य है, लेकिन असली चुनौती अब शुरू होती है। केवल लाइसेंस निरस्त कर देना पर्याप्त नहीं होगा। यदि पर्यावरणीय क्षति, राजस्व हानि या अन्य कानूनी उल्लंघनों के आरोपों में तथ्य हैं, तो उनकी निष्पक्ष जांच और दोषियों के खिलाफ ठोस कार्रवाई भी उतनी ही आवश्यक है। अन्यथा यह कदम भी केवल एक प्रतीकात्मक कार्रवाई बनकर रह जाएगा। जनता अब यह देखना चाहती है कि क्या यह निर्णय वास्तव में सुशासन, पारदर्शिता और जवाबदेही की दिशा में उठाया गया कदम है या फिर समय के साथ प्रभाव और दबाव के आगे व्यवस्था फिर से पुरानी राह पर लौट जाएगी। मध्यप्रदेश की नदियां, पर्यावरण और आम नागरिक अब घोषणाओं से आगे बढ़कर निर्णायक और स्थायी कार्रवाई की अपेक्षा कर रहे हैं।
-मिलिंद ठाकरे

