बालाघाट: कभी नक्सलवाद के खौफ के साये में जीने वाले बालाघाट जिले के वो गांव, जहां विकास की राह देखती आंखें, बेहतर शिक्षा की आस में बैठे बच्चे और बुनियादी सुविधाओं के इंतजार में ग्रामीणों की जिंदगी गुजरती जा रही थी। आज उन्हीं गांवों में विकास की नई उम्मीद जगाने जिला प्रशासन सक्रिय हो गया है।
मकसद सिर्फ सड़क, बिजली और पानी पहुंचाना नहीं, बल्कि उन चेहरों पर मुस्कान लाना भी है, जो वर्षों से बेहतर जिंदगी का सपना संजोए हुए हैं। अब बालाघाट जिले के नक्सल प्रभावित रहे 100 गांवों के विकास के लिए प्रशासन ने विशेष पहल शुरू की है।
मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की सीमा से लगा बालाघाट जिला करीब 35 सालों तक नक्सलवाद से ग्रसित रहा। खासकर जिले के सीमावर्ती और वनांचल गांव नक्सल हिंसा से पीड़ित थे। यहां के पहुंच विहीन रास्ते और दुर्गम पहाड़ियां नक्सलवाद की पनाहगाह थीं। प्रभावित इलाकों में नक्सली गतिविधियां इतनी सक्रिय थीं कि नक्सलियों ने इन गांवों तक बुनियादी सुविधाएं पहुंचने ही नहीं दी।
लेकिन अब वक्त का पासा पलट चुका है और मध्यप्रदेश समेत बालाघाट जिला भी नक्सल मुक्त हो चुका है। अब इन्हीं गांवों में सरकार और जिला प्रशासन द्वारा विकास की नई इबारत लिखने का संकल्प लिया गया है। प्रशासन ने ऐसे 100 गांवों को चिन्हित किया है, जहां बुनियादी सुविधाएं पहुंचाई जाएंगी। इसके लिए प्रशासनिक अमला गांव-गांव जाकर लोगों से समस्याएं समझ रहा है और निराकरण के फैसले ले रहा है।
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कलेक्टर खुद कर रहे दुर्गम गांवों का दौरा
बालाघाट के पिछड़े 100 गांवों में अधिकारी सेक्टर में बंटकर दौरा कर रहे हैं। इन गांवों में सबसे ज्यादा अधोसंरचना की जरूरत महसूस हो रही है, जिस पर सबसे अधिक फोकस किया जा रहा है। इसके अलावा लोगों को रोजगार और पशुपालन से जोड़ने की कवायद भी हो रही है।
कलेक्टर आदित्य सिंह खुद इन 100 गांवों में शामिल दुर्गम गांवों का दौरा कर रहे हैं। वे लांजी विकासखंड की देवरबेली ग्राम पंचायत के बरगुड़-सतोना, केराडीह, सायर-संदूका जैसे गांवों में पहुंचे और ग्रामीणों से सीधा संवाद किया। वे आंगनवाड़ी केंद्रों में भी पहुंचे और वहां की स्थितियों का जायजा लिया। इस दौरान उन्होंने एक बच्चे को गोद में लिया और दुलार किया। आंगनवाड़ी में बच्चों को दिए जाने वाले नाश्ते की गुणवत्ता परखने के लिए कलेक्टर ने खुद उसका स्वाद भी चखा।
ग्रामीणों से संवाद के बाद कलेक्टर ने शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, बिजली, सड़क और रोजगार जैसी बुनियादी जरूरतों को समझते हुए अधिकारियों को समस्याओं के निराकरण के निर्देश दिए।
अब सवाल सिर्फ विकास या योजनाओं की घोषणा का नहीं, बल्कि उन्हें जमीन पर उतारने का है। इन गांवों के बच्चों को बेहतर शिक्षा, परिवारों को रोजगार और ग्रामीणों को सम्मानजनक जीवन मिले, यही इस पहल की असली कसौटी होगी। उम्मीद है कि कभी नक्सलवाद के लिए पहचाने जाने वाले ये गांव अब विकास, विश्वास और खुशहाली की नई पहचान बनेंगे।

