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आखिर कौन दे रहा है खनन माफिया को संरक्षण?

मप्र में अवैध खनन का कारोबार अब केवल प्राकृतिक संसाधनों की लूट तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह कानून और शासन व्यवस्था के लिए खुली चुनौती बनता जा रहा है। भोपाल के कजलिखेड़ा थाने के सामने खनिज विभाग और पुलिस की संयुक्त कार्रवाई के दौरान जो घटनाक्रम सामने आया, उसने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अवैध गिट्टी-मुरम से भरे डंपरों को जब्त करने पहुंची टीम को न केवल रोका गया, बल्कि महिला खनिज अधिकारी को खुलेआम धमकाया गया और शासकीय कार्य में बाधा डालने का दुस्साहस भी किया गया।सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर ऐसे लोगों के हौसले इतने बुलंद कैसे हो जाते हैं कि वे थाने के मुख्य द्वार पर ही पुलिस और प्रशासन को चुनौती देने लगते हैं? यदि कानून का भय होता, तो कोई भी व्यक्ति सार्वजनिक रूप से अधिकारियों को नौकरी खा जाने और गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी देने का साहस नहीं करता। यह घटना केवल एक अवैध खनन प्रकरण नहीं, बल्कि शासन की साख और कानून के राज की परीक्षा भी है। प्रदेश के कई हिस्सों में रेत, गिट्टी और मुरम माफिया लगातार सक्रिय हैं। समय-समय पर अधिकारियों पर हमले, वाहनों से कुचलने की घटनाएं और दबाव बनाने की कोशिशें सामने आती रही हैं। इसके बावजूद यदि माफिया बेखौफ हैं तो स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठता है कि उन्हें राजनीतिक, आर्थिक या अन्य किसी प्रकार का संरक्षण तो प्राप्त नहीं है? सरकार और प्रशासन को यह समझना होगा कि केवल एफआईआर दर्ज कर देना पर्याप्त नहीं है। जरूरत है कि ऐसे मामलों में त्वरित और कठोर कार्रवाई हो। अवैध खनन से जुड़े नेटवर्क, आर्थिक स्रोतों और कथित संरक्षकों की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। यदि दोषियों पर उदाहरण प्रस्तुत करने वाली कार्रवाई नहीं हुई तो यह संदेश जाएगा कि कानून तोड़ने वालों के लिए व्यवस्था में अब भी नरमी बरती जा रही है। खनिज संपदा जनता की संपत्ति है और उसकी रक्षा करना सरकार की जिम्मेदारी। जो लोग पुलिस, प्रशासन और कानून को चुनौती देकर जीवन दायिनी नर्मदा, बेतवा और चंबल जैसी तमाम नदियों को खोदने का अवैध कारोबार चला रहे हैं, उनके खिलाफ बिना किसी दबाव और भेदभाव के कार्रवाई होना समय की मांग है। अन्यथा खनन माफिया का यह आतंक आने वाले समय में शासन के लिए और बड़ी चुनौती बन सकता है।

-मिलिंद ठाकरे

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