मप्र लोकायुक्त संगठन को सूचना के अधिकार (आरटीआई) कानून से छूट देने के मामले में सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी केवल एक कानूनी बहस नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही पर बड़ा सवाल है। अदालत ने साफ पूछा है कि आखिर लोकायुक्त कोई खुफिया या सुरक्षा एजेंसी कैसे हो सकती है, जिसे आरटीआई कानून की धारा 24(4) के तहत छूट दी जाए? यह सवाल सीधे उस मानसिकता पर चोट करता है, जिसमें भ्रष्टाचार की जांच करने वाली संस्थाओं को भी पारदर्शिता से ऊपर मान लिया जाता है। विडंबना देखिए, जिस लोकायुक्त का काम सत्ता और प्रशासन में भ्रष्टाचार पर निगरानी रखना है, वही संस्था खुद सूचना देने से बचना चाहती है। यदि जांच एजेंसी को पूरी तरह गोपनीयता की ढाल मिल जाएगी, तो उसकी कार्यप्रणाली पर जनता का भरोसा कैसे कायम रहेगा? लोकतंत्र में कोई भी संस्था अस्पृश्य नहीं हो सकती, खासकर तब जब वह जनता के टैक्स से संचालित होती हो। सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी केवल अधिसूचना तक सीमित नहीं रही। अदालत ने मप्र सरकार के वकीलों की अनुपस्थिति भी तल्ख टिप्पणी की। यह स्थिति बताती है कि सरकार अदालतों में गंभीर मामलों को कितनी प्राथमिकता देती है। जब सर्वोच्च न्यायालय में राज्य का पक्ष रखने वाले वकील ही मामले की जानकारी से अनभिज्ञ हों, तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, संवैधानिक जवाबदेही का संकट भी है। दरअसल, आरटीआई कानून का मूल उद्देश्य शासन में पारदर्शिता और नागरिकों की भागीदारी बढ़ाना था। पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न संस्थाओं को विशेष छूट देने की प्रवृत्ति बढ़ी है। इससे लोकतंत्र में जवाबदेही कमजोर होती है। यदि लोकायुक्त जैसी संस्था भी सूचना देने से मुक्त हो जाएगी, तो आम नागरिक भ्रष्टाचार के खिलाफ किस पर भरोसा करेगा? अब सबकी नजर इस मामले में 20 मई को होने वाली सुनवाई पर है, जब महाधिवक्ता को स्वयं अदालत में जवाब देना है। यदि राज्य सरकार लोकायुक्त को आरटीआई से बाहर रखने का ठोस कानूनी आधार नहीं दे पाती, तो 2011 की अधिसूचना रद्द हो सकती है। यह फैसला केवल मप्र ही नहीं, बल्कि देशभर में पारदर्शिता बनाम गोपनीयता की बहस को नई दिशा देगा। सवाल यही है कि, क्या भ्रष्टाचार से लड़ने वाली संस्थाओं को भी जनता से छिपकर काम करने का अधिकार होना चाहिए?
-मिलिंद ठाकरे

