हेमंत खंडेलवाल की राजनीतिक क्षमताओं पर उठने लगे सवाल, एक साल बाद भी अपनी टीम घोषित नहीं कर पाए प्रदेश अध्यक्ष
भोपाल। मप्र भाजपा में प्रदेश कार्यसमिति के गठन को लेकर बना असमंजस अब केवल संगठनात्मक विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह पार्टी के भीतर शक्ति संतुलन, गुटीय दबाव और नेतृत्व क्षमता की परीक्षा का मुद्दा बन गया है। जुलाई 2025 में प्रदेश भाजपा अध्यक्ष की कमान संभालने वाले हेमंत खंडेलवाल का कार्यकाल एक वर्ष पूरा होने की ओर है, लेकिन उनकी नई प्रदेश कार्यसमिति अब तक अस्तित्व में नहीं आ सकी है।
पार्टी सूत्रों के अनुसार प्रदेश कार्य समिति के गठन में सबसे बड़ी बाधा ‘नियम बनाम निष्ठा’ की लड़ाई बन गई है। केंद्रीय नेतृत्व संगठन की निर्धारित गाइडलाइन और सीमित आकार की प्रदेश कार्यसमिति पर अड़ा हुआ है, जबकि प्रदेश के प्रभावशाली गुट अपने-अपने समर्थकों को संगठन में जगह दिलाने के लिए पूरा दबाव बना रहे हैं।
सबसे अधिक चर्चा केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया खेमे को लेकर है। बताया जा रहा है कि सिंधिया अपने उन समर्थकों को संगठन में समायोजित करवाना चाहते हैं, जिन्होंने चुनावी पराजय के बावजूद पार्टी के लिए काम किया है या जो भविष्य में राजनीतिक भूमिका की उम्मीद लगाए बैठे हैं। लेकिन भाजपा नेतृत्व इस बार किसी भी प्रकार के ‘स्पेशल ट्रीटमेंट’ के पक्ष में दिखाई नहीं दे रहा है। दिल्ली का स्पष्ट संदेश है कि संगठन में जगह योग्यता, सक्रियता और संगठनात्मक जरूरत के आधार पर मिलेगी, न कि केवल राजनीतिक निष्ठा के आधार पर।
यही कारण है कि भोपाल और दिल्ली के बीच बैठकों, फीडबैक और समन्वय का लंबा दौर चल रहा है। पार्टी इस बार प्रदेश कार्यसमिति का आकार लगभग 106 सदस्यों तक सीमित रखना चाहती है। ऐसे में क्षेत्रीय, जातीय, सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों को साधना किसी चुनौती से कम नहीं है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह पूरा घटनाक्रम हेमंत खंडेलवाल के लिए नेतृत्व की पहली बड़ी अग्निपरीक्षा बन गया है। इसमें कोई दो राय नहीं कि उन्होंने प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद सादगी की अलग पहचान बनाई है। उन्होंने पार्टी पद के साथ मिलने वाली कई सुविधाओं से दूरी रखकर कार्यकर्ताओं के बीच सकारात्मक संदेश देने का प्रयास किया। लेकिन राजनीति केवल सादगी से नहीं, बल्कि संगठन संचालन, निर्णय क्षमता और दबावों के बीच संतुलन बनाने की कला से भी आंकी जाती है।
यही वह मोर्चा है जहां खंडेलवाल अब तक अपेक्षित प्रभाव नहीं छोड़ पाए हैं। प्रदेश भाजपा के इतिहास में शायद ही कोई ऐसा अध्यक्ष रहा हो जिसे अपनी कार्यसमिति गठित करने में इतना लंबा समय लगा हो। यही कारण है कि कांग्रेस को भी भाजपा पर हमले का अवसर मिल गया है। विपक्ष लगातार आरोप लगा रहा है कि भाजपा में गुटबाजी चरम पर है और प्रदेश नेतृत्व अपनी ही टीम तय करने में असहाय दिखाई दे रहा है।
दरअसल, कार्यसमिति गठन में हो रही देरी भाजपा के भीतर बदलते शक्ति समीकरणों की कहानी भी कह रही है। एक तरफ केंद्रीय नेतृत्व संगठन को पुराने और समर्पित कार्यकर्ताओं के हाथों मजबूत करना चाहता है, तो दूसरी तरफ सत्ता और संगठन में प्रभाव रखने वाले नेता अपने राजनीतिक आधार को सुरक्षित रखने की कवायद में जुटे हैं।
नई कार्यसमिति जब भी सामने आएगी, वह केवल सझस्यों की सूची नहीं होगी, बल्कि यह बताएगी कि मप्र भाजपा में वास्तविक शक्ति का केंद्र कौन है-प्रदेश अध्यक्ष, दिल्ली नेतृत्व या फिर पार्टी के प्रभावशाली गुट।
हेमंत खंडेलवाल के सामने सबसे बड़ी चुनौतियां
- ज्योतिरादित्य सिंधिया, शिवराज सिंह चौहान, नरेंद्र सिंह तोमर, कैलाश विजयवर्गीय, प्रहलाद पटेल और अन्य प्रभावशाली समूहों के बीच संतुलन बनाना।
- सीमित सदस्य संख्या में सभी क्षेत्रों और वर्गों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना।
- पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं और नए राजनीतिक चेहरों के बीच सामंजस्य बैठाना।
- केंद्रीय नेतृत्व की गाइडलाइन का पालन करते हुए असंतोष को नियंत्रित रखना।
एक साल का कार्यकाल, लेकिन टीम अब भी अधूरी
- जुलाई 2025 : हेमंत खंडेलवाल बने भाजपा प्रदेश अध्यक्ष।
- 2025-26 : संगठन विस्तार और बैठकों का दौर जारी।
- जून 2026 : एक वर्ष पूरा होने को, लेकिन प्रदेश कार्यसमिति का इंतजार बरकरार।
कार्यसमिति बताएगी हेमंत की संगठन पर कितनी पकड़?
प्रदेश कार्यसमिति का गठन अब महज संगठनात्मक औपचारिकता नहीं रह गया है। यह हेमंत खंडेलवाल की राजनीतिक स्वीकार्यता, निर्णय क्षमता और संगठन पर पकड़ का सबसे बड़ा परीक्षण बन चुका है। कार्यसमिति की अंतिम सूची तय करेगी कि भाजपा में नेतृत्व की वास्तविक कमान किसके हाथ में है और प्रदेश अध्यक्ष अपने पहले बड़े संगठनात्मक इम्तिहान में कितने सफल साबित होते हैं।

