Monday, September 21, 2026
Contact: +91 97559 93555
Email: tathyawani@gmail.com
spot_img
Hometrending newsक्या जनता हटा सकती है अपना सांसद या विधायक? राघव चड्ढा की...

क्या जनता हटा सकती है अपना सांसद या विधायक? राघव चड्ढा की मांग से सिस्टम पर सवाल

दिल्ली। आम आदमी पार्टी के सांसद राघव चड्ढा द्वारा संसद में उठाई गई राइट टू रिकॉल की मांग ने देश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। उनका कहना है कि जब जनता को अपने प्रतिनिधि चुनने का अधिकार है, तो उसे बीच कार्यकाल में उन्हें हटाने की ताकत भी मिलनी चाहिए। इस मांग के बाद लोगों के मन में सवाल उठ रहा है कि आखिर मौजूदा कानून में सांसद या विधायक को हटाने की प्रक्रिया क्या है और राइट टू रिकॉल का मतलब क्या होता है।

संसद में राघव चड्ढा ने क्या कहा?

सूत्रों अनुसार संसद में अपनी बात रखते हुए राघव चड्ढा ने मौजूदा लोकतांत्रिक व्यवस्था की एक बड़ी कमजोरी की ओर इशारा किया। उन्होंने कहा कि चुनाव से पहले नेता जनता के पीछे-पीछे घूमते हैं, लेकिन चुनाव जीतने के बाद तस्वीर उलट जाती है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब राष्ट्रपति के महाभियोग, सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव और जजों को हटाने जैसी व्यवस्थाएं हैं, तो फिर गैर-जिम्मेदार सांसदों और विधायकों को हटाने का अधिकार सीधे जनता को क्यों नहीं मिलना चाहिए। उनके मुताबिक, राइट टू रिकॉल लोकतंत्र पर हमला नहीं, बल्कि लोकतंत्र को सुरक्षित रखने का एक मजबूत औजार है।

जानें क्या है राइट टू रिकॉल?

बता दें राइट टू रिकॉल एक ऐसी लोकतांत्रिक व्यवस्था है, जिसमें मतदाताओं को अपने चुने हुए प्रतिनिधि को कार्यकाल पूरा होने से पहले हटाने का अधिकार मिलता है। इस प्रक्रिया में जनता पहले एक प्रस्ताव के जरिए असंतोष दर्ज करती है, फिर तय संख्या में हस्ताक्षर जुटाए जाते हैं और उसके बाद मतदान कराया जाता है। अगर बहुमत प्रतिनिधि के खिलाफ जाता है, तो उसे पद से हटाया जा सकता है। कनाडा और स्विट्ज़रलैंड जैसे कुछ देशों में इस तरह की व्यवस्था लागू है।

सांसद और विधायक को हटाने के मौजूदा नियम

भारत में फिलहाल जनता के पास सीधे तौर पर सांसद या विधायक को हटाने का अधिकार नहीं है। हालांकि, कानून के तहत कुछ परिस्थितियों में जनप्रतिनिधियों की सदस्यता खत्म की जा सकती है।

हाल ही में संसद में पेश किए गए एक संविधान संशोधन प्रस्ताव में यह व्यवस्था बताई गई थी कि अगर किसी मंत्री, सांसद या विधायक पर गंभीर आपराधिक मामला दर्ज होता है और गिरफ्तारी होती है, तो उसे पद से हटाया जा सकता है। इसके तहत—

  • ऐसे अपराध जिनमें पांच साल या उससे ज्यादा की सजा का प्रावधान हो
  • अगर किसी जनप्रतिनिधि को 30 दिन तक जमानत न मिले
  • इस्तीफा न देने की स्थिति में 31वें दिन स्वतः पद से हटाने का प्रावधान

 क्या कहता है 1951 जनप्रतिनिधित्व अधिनियम?

जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 के तहत भी सांसद और विधायक की सदस्यता रद्द करने के नियम मौजूद हैं। अगर कोई जनप्रतिनिधि संविधान का उल्लंघन करता है, हत्या जैसे गंभीर अपराध में दोषी ठहराया जाता है या समाज में वैमनस्य फैलाने का दोषी पाया जाता है, तो उसकी सदस्यता खत्म की जा सकती है। वहीं, दो साल से ज्यादा की सजा होने पर न सिर्फ सदस्यता रद्द होती है, बल्कि छह साल तक चुनाव लड़ने पर भी रोक लग जाती है।

जनता के हाथ अब भी बंधे

वर्तमान व्यवस्था में भारत की जनता अपने चुने हुए सांसद या विधायक को सिर्फ इसलिए नहीं हटा सकती कि, वह काम नहीं कर रहा या वादों पर खरा नहीं उतर रहा। ऐसे मामलों में मतदाताओं को अगले चुनाव तक इंतजार करना पड़ता है। यही वजह है कि राघव चड्ढा की राइट टू रिकॉल की मांग को लोकतंत्र में जवाबदेही बढ़ाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है और इस पर देशभर में चर्चा तेज हो गई है।

 

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

ई-पेपर

13 to 19 September 2026
6 to 12 September 2026

शासकीय निविदाएं

विज्ञापन