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बंदूक की गूंज नहीं, किताबों की खुशबू से महक रहा है छत्तीसगढ़

विश्वास लौटा तो 9 हजार बच्चे फिर पढ़ाई में जुट गये

रायपुर। छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल में अब एक बड़ा बदलाव दिखाई दे रहा है। जिन इलाकों में कभी हिंसा और डर का माहौल रहता था, वहां आज बच्चों के हाथों में किताबें और कलम हैं। शिक्षा की इस नई रोशनी ने पूरे क्षेत्र में उम्मीद जगाई है। सरकार और प्रशासन के प्रयासों से अब तक 263 बंद पड़े स्कूलों को दोबारा शुरू किया गया है, जिससे हजारों परिवारों में विश्वास लौटा है। इन स्कूलों के खुलने से 9,000 से अधिक बच्चे फिर से पढ़ाई से जुड़ गए हैं, जबकि दूरस्थ क्षेत्रों में शिक्षा की पहुंच बढ़ाने के लिए करीब 100 नए स्कूलों का निर्माण भी जारी है।

इस बदलाव की सबसे बड़ी मिसाल इसी साल सामने आई, जब सुकमा जिले के 46 आदिवासी छात्रों ने नीट और जेईई जैसी प्रतिष्ठित परीक्षाएं पास कीं। इनमें 43 छात्रों ने नीट और 3 छात्रों ने जेईई क्वॉलीफाई किया। खास बात यह है कि ये सभी बच्चे उसी बस्तर के हैं, जहां कभी स्कूलों पर ताले लगे रहते थे और नक्सली गतिविधियों के कारण पढ़ाई बाधित हो जाती थी। जिला प्रशासन द्वारा शुरू किए गए ‘क्षितिज कोचिंग सेंटर’ ने इन छात्रों को नई दिशा देने में अहम भूमिका निभाई। यहां बच्चों को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए मार्गदर्शन, पढ़ाई की सुविधा और प्रेरणा मिली। इसके परिणाम अब सामने आने लगे हैं। कहने का मतलब है बस्तर के गांवों में अब माहौल बदल रहा है। जहां कभी बंदूक और बारूद की गंध से लोग सहमे रहते थे, वहीं अब घरों में बच्चों की पढ़ाई, करियर और सपनों की चर्चा हो रही है। बदलते बस्तर की यह तस्वीर बताती है कि अब यहां बंदूक नहीं, किताबें और सपने पल रहे हैं।

प्रेरणादायी है संध्या और रमेश की कहानी

बदलते बस्तर की सबसे प्रेरक कहानियों में से एक है संध्या की सफलता। संध्या ने सुकमा और दंतेवाड़ा में पढ़ाई की और क्षितिज कोचिंग सेंटर से तैयारी की। पहले प्रयास में सीट नहीं मिलने के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। दूसरी बार उन्होंने नीट परीक्षा पास कर डॉक्टर बनने के अपने सपने की ओर कदम बढ़ाया। संध्या बताती हैं कि बचपन में वे खेल-खेल में डॉक्टर बनने का सपना देखा करती थीं। जब वे 11वीं कक्षा में पहुंचीं तो उनके पिता ने उन्हें नीट की किताबें दिलाईं। तभी से उन्होंने ठान लिया कि डॉक्टर बनना है। आज उनकी सफलता न केवल उनके सपनों की जीत है, बल्कि उनके माता-पिता और पूरे इलाके की उम्मीदों का भी परिणाम है। इसी तरह रमेश कुंजाम की कहानी भी बदलाव का प्रतीक है। यह कहानी बताती है कि कभी हिंसा से प्रभावित परिवार भी अब अपने बच्चों को पढ़ा-लिखाकर समाज की मुख्यधारा से जोड़ना चाहते हैं।

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