नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात के पीपावाव पोर्ट विस्तार परियोजना के खिलाफ दायर याचिका को खारिज करते हुए कहा कि देश के विकास के लिए बुनियादी ढांचा जरूरी है और पर्यावरण के नाम पर सब कुछ नहीं रोका जा सकता है।
बता दें सोमवार को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता से सख्त सवाल करते हुए कहा कि आखिर ऐसी कौन-सी विकास परियोजना है, जिसका पर्यावरण समूहों ने विरोध नहीं किया हो। कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि बंदरगाह, सड़क और अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं देश के विकास और आर्थिक प्रगति के लिए बेहद जरूरी हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना आवश्यक है, लेकिन हर परियोजना का विरोध करना उचित नहीं माना जा सकता।
पर्यावरणविद चेतन कुमार नविनत्रे व्यास की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अनीता शेनॉय ने अदालत में दलील दी कि परियोजना को मंजूरी देने से पहले समुद्री जैव विविधता पर पड़ने वाले प्रभाव का समुचित आकलन नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि इस परियोजना से ऑलिव रिडले कछुओं, विभिन्न पक्षी प्रजातियों, मैंग्रोव वनस्पतियों और समुद्री जीवों पर गंभीर असर पड़ सकता है, लेकिन इन पहलुओं का पर्याप्त वैज्ञानिक अध्ययन किए बिना ही पर्यावरणीय स्वीकृति दे दी गई।
हालांकि, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता की दलीलों से असहमति जताते हुए कहा कि पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) रिपोर्ट में इन आशंकाओं को आधारहीन बताया गया है। अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) पहले ही परियोजना को मंजूरी दे चुका है।
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट टिप्पणी की कि पर्यावरण संरक्षण निस्संदेह महत्वपूर्ण है, लेकिन विकास परियोजनाओं को पूरी तरह रोक देना किसी समस्या का व्यावहारिक समाधान नहीं हो सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि गुजरात जैसे तटीय राज्यों में ही बड़े बंदरगाहों के विकास की सबसे अधिक संभावनाएं हैं और सवाल उठाया कि यदि यहां नहीं, तो आखिर ऐसे इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स कहां विकसित किए जाएंगे।

