जबलपुर: दीपावली का त्योहार रोशनी और खुशियों का प्रतीक है, लेकिन जब इस रोशनी में मेहनत, हुनर और आत्मनिर्भरता का रंग जुड़ जाए, तो इसकी चमक और भी बढ़ जाती है। जबलपुर के दिव्यांग बच्चों ने अपने हुनर से ऐसे ही उम्मीद के दीये तैयार किए हैं।
तस्वीरें हौसलों की मिसाल पेश कर रही
जबलपुर के वंदन पुनर्वास एवं अनुसंधान संस्थान की ये तस्वीरें हौसलों की मिसाल पेश कर रही हैं। यहां दिव्यांग बच्चे अपने हाथों से मिट्टी के दीये बना रहे हैं। इन दीयों में सिर्फ मिट्टी का आकार नहीं, बल्कि बच्चों की मेहनत, आत्मविश्वास और आत्मनिर्भर बनने का जज्बा भी झलक रहा है। इस दीपावली इनके बनाए दीये घर-आंगन रोशन करने के साथ समाज को भी एक खास संदेश देंगे कि हुनर और हौसलों के आगे कोई बाधा बड़ी नहीं होती।
सपनों की उड़ान और हुनर के आगे हर चुनौती छोटी पड़ गई
जब कोई मिट्टी का दिया ख़ूबसूरत आकार में सजता है, तो इन बच्चों के चेहरों पर चमक उठ जाती है, एक अनमोल मुस्कान बिखर जाती है। कोई मिट्टी को आकार दे रहा है, तो कोई बड़ी बारीकी और लगन से उसमें रंग भर रहा है। कुदरत ने भले ही इन्हें कुछ शारीरिक बंदिशें दी हों, लेकिन इनके सपनों की उड़ान और हुनर के आगे हर चुनौती छोटी पड़ गई है। वंदन संस्था का यह प्रांगण इस वक्त सिर्फ दीयों से नहीं, बल्कि इन बच्चों के अटूट आत्मविश्वास से जगमगा रहा है।
दरअसल, असली दीपावली सिर्फ मिट्टी का दीया जला देने में नहीं, बल्कि किसी के जीवन में उम्मीद का पहला चिराग रोशन करने में है। इन बच्चों के हाथों से बने ये दीये जब आपके और हमारे घरों की देहलीज पर जलेंगे, तो सिर्फ आँगन नहीं चमकेगा, बल्कि इन मासूमों के आत्मनिर्भर बनने का सपना भी साकार होगा। यह कोशिश समाज को याद दिलाती है कि अगर सही अवसर और थोड़ा सा संबल मिले, तो कोई भी कमी हुनर के रास्ते की रुकावट नहीं बन सकती।
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असली उजाला वही है जो किसी के जीवन से अंधेरा मिटा सके
अंधेरा कितना भी गहरा हो, उम्मीद की एक लौ उसे मिटाने के लिए काफ़ी होती है। जबलपुर के इन बच्चों ने साबित कर दिखाया है कि हौसले अगर बुलंद हों, तो हर मुश्किल राह आसान हो जाती है। इस बार जब आप अपने घरों में दीये जलाएँ, तो इन नन्हे हाथों की मेहनत और इनके स्वाभिमान को अपने दिल में जगह ज़रूर दें… क्योंकि असली उजाला वही है जो किसी के जीवन से अंधेरा मिटा सके।

