भविष्य में हो सकती है गंभीर और जानलेवा दुर्घटनाएं
बालाघाट: भारत सरकार के पेट्रोल में 20% एथेनॉल मिलाने (E20) के सरकारी फैसले से वाहन मालिकों में माइलेज घटने, इंजन खराब होने और ईंधन में नमी के कारण जंग लगने की आशंकाओं को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है, जबकि सरकार का तर्क है कि इससे विदेशी तेल पर निर्भरता कम होगी और किसानों को लाभ मिलेगा।
वही एथेनॉल बनाने के दौरान और उपरांत पर्यावरण को होने वाले प्रदुषण की ओर किसी का ध्यान नही जा रहा है। एथेनॉल बनाने के समय जिस स्थान पर प्लांट स्थापित किया गया जाता है, उस स्थान के आसपास जल, जमीन, पर्यावरण और जीव-जंतुओं पर इसका विपरीत असर पड़ता है, जिसके गंभीर परिणाम आम लोगों को भुगतने पड़ सकते है।
एथेनॉल प्लांटों से उत्पन्न होने वाले गंभीर संकट
पर्यावरण समूह ‘साइंटिस्ट्स फॉर पीपल’ के अनुसार, एथेनॉल प्लांट एसिटाल्डिहाइड, फॉर्मेल्डिहाइड, एक्रोलीन और हेक्सेन जैसे प्रदूषक छोड़ते हैं। ये ऐसे रसायन हैं जो श्वसन संबंधी बीमारियों, तंत्रिका संबंधी क्षति और कैंसर से जुड़े हैं। एथेनॉल प्लांट से पर्यावरण को मुख्य रूप से भारी पानी की खपत, गंदे पानी के रिसाव, वायु प्रदूषण और मिट्टी की सेहत पर असर पड़ने जैसे बड़े नुकसान होते हैं। हालांकि ये प्लांट हरित ऊर्जा का विकल्प हैं। एक लीटर एथेनॉल बनाने में लगभग 8 से 12 लीटर पानी का उपयोग होता है, जिससे भूजल स्तर तेजी से गिरता है। कारखानों से निकलने वाला जहरीला और गंदा अपशिष्ट (विनासे) यदि बिना उपचार के नदियों या मिट्टी में मिल जाए, तो पानी में ऑक्सीजन की मात्रा कम कर देता है और जलीय जीवों को मार देता है।
वायु, स्वास्थ्य और कृषि पर प्रभाव
एथेनॉल डिस्टिलरी को ‘रेड कैटेगरी’ (अत्यधिक प्रदूषण फैलाने वाली श्रेणी) में रखा गया है। इनसे एसीटल्डिहाइड और फॉर्मल्डिहाइड जैसी जहरीली गैसें निकलती हैं। इन जहरीले रसायनों और धुएं से हवा की गुणवत्ता बिगड़ती है तथा आसपास के लोगों को सांस की बीमारी और अन्य गंभीर स्वास्थ्य खतरे होते हैं। अनाज या मक्का जैसी फसलों के अत्यधिक उत्पादन के लिए लगातार एक ही तरह की खेती (मोनोक्रॉपिंग) करने से मिट्टी की उर्वरता और उसकी सेहत खराब होती है। ईंधन के लिए फसलों के उपयोग से कृषि भूमि पर दबाव बढ़ता है, जिससे दीर्घकालिक पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित होता है।
जीरा जैसे न बन जायें हालत है ?
जीरा के अनुभव के केंद्र में स्थित एथेनॉल कारखाना साढ़े तीन साल से अधिक समय से बंद है, लेकिन इसके प्रभाव जीरा शहर और उसके आसपास के दर्जनों गांवों में रोजमर्रा की जिंदगी को आकार देना जारी रखते हैं। त्वचा की ऐसी बीमारियाँ जो ठीक नहीं होतीं, गुर्दे और कैंसर के रोगियों की बढ़ती संख्या, गर्भधारण करने में असमर्थ या बार-बार गर्भपात से पीड़ित महिलाएं, पशुधन की मौतें और भूजल का इतना प्रदूषित होना कि पीने का पानी भी बीमारी का खतरा पैदा करता है।
पंजाब सरकार ने बंद कराया एथेनॉल प्लांट
मालब्रोस इंटरनेशनल प्राइवेट लिमिटेड नामक कारखाना, जिसे स्थानीय रूप से मालब्रोस डिस्टिलरी के नाम से जाना जाता है, की स्थापना 2006 में हुई थी। यह कारखाना अल्कोहल और एथेनॉल का उत्पादन करता था। स्थानीय निवासियों के महीनों तक चले निरंतर विरोध प्रदर्शन के बाद प्लांट को बंद किए जाने से पहले यह लगभग 18 वर्षों तक संचालित रहा। किसानों ने 24 जुलाई 2022 को अपना आंदोलन शुरू किया, जो 177 दिनों तक लगातार जारी रहा। जनवरी 2023 में बढ़ते जन दबाव और पर्यावरणीय चिंताओं का हवाला देते हुए पंजाब सरकार ने एथेनॉल कारखाने को बंद करने का आदेश दिया।
जीरो डिस्चार्ज के लिए रिवर्स बोरिंग तकनीक
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की 2023 की एक रिपोर्ट में इस स्थिति का ब्यौरा दिया गया था, जिसमें कहा गया था कि जीरा स्थित एथेनॉल संयंत्र ने कथित तौर पर खतरनाक औद्योगिक कचरे के निपटान के लिए रिवर्स बोरिंग तकनीक का इस्तेमाल किया था। जहरीले अपशिष्टों को जमीन के काफी नीचे इंजेक्ट किया गया, जिससे जलभंडार दूषित हो गए और भूजल मानव उपभोग के लिए अनुपयुक्त हो गया। जांच में पता चला कि संयंत्र प्रबंधन ने जहरीले कचरे के निपटान के लिए लगभग 25 बोरवेल खोदे थे। जिसके कारण लगभग 15 किलोमीटर के क्षेत्र में भूजल प्रदूषण फैल गया।
खापा और बासी के एथेनॉल प्लांट बन सकते है खतरा ?
बालाघाट जिले के ग्राम खापा और बासी में विसाग बायोफ्यूल्स तथा जैक्सन बायोफ्यूल्स के एथेनॉल प्लांट संचालित है। जानकारी के अनुसार कुछ समय पहले विसाग बायोफ्यूल्स के एथेनॉल प्लांट से निकलने वाले जहरीले या दूषित अपशिष्ट पदार्थ (वेस्ट) को खाने की वजह से 14 बकरियों की मौत का गंभीर मामला सामने आया था। इस घटना में एक बैल भी गंभीर रूप से बीमार हो गया था। इस घटना के बाद न तो मृत पशुओं का कोई आधिकारिक पोस्टमार्टम कराया गया और न ही पुलिस में कोई शिकायत दर्ज की गई। पशु मालिक और कंपनी प्रबंधन के बीच करीब ढाई लाख रुपये का हर्जाना देकर मामला आपस में ही सुलझा लिया गया।
ग्रामीणों को सता रहा जान का खतरा !
स्थानीय ग्रामीणों का मानना है कि एथेनॉल प्लांट से निकलने वाले प्रदूषण, तेज दुर्गंध और हानिकारक कचरे से आस-पास के ग्रामीण और पर्यावरण काफी प्रभावित हो रहे हैं। स्थानीय निवासियों ने चिंता जताई है कि “अभी पशु मरे हैं, आगे चलकर यह इंसानों के लिए भी जानलेवा साबित हो सकता है।” ग्रामीणों का आरोप है कि प्लांट से निकलने वाला दूषित पानी और कचरा खुले में छोड़े जाने से भविष्य में गंभीर और जानलेवा दुर्घटनाएं हो सकती हैं।

