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जरुरत अभियानों की नीयत बदलने की?

मप्र सरकार 7 अगस्त से मुख्यमंत्री जन विश्वास अभियान शुरू करने जा रही है। उद्देश्य है कि अधिकारी गांव-गांव और वार्ड-वार्ड पहुंचकर लोगों की समस्याएं सुनें, लंबित प्रकरणों का निराकरण करें और सरकारी योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाएं। कागज पर यह पहल जितनी आकर्षक दिखती है, उसकी असली परीक्षा जमीन पर होगी।

सवाल यह नहीं है कि अभियान कितना बड़ा है, बल्कि यह है कि इसकी जरूरत आखिर पड़ी क्यों? यदि सीएम हेल्पलाइन, जनसुनवाई, लोक सेवा गारंटी और राजस्व न्यायालय जैसी व्यवस्थाएं नियमित रूप से प्रभावी ढंग से काम कर रही होतीं, तो अलग से अभियान चलाने की नौबत शायद नहीं आती। यह अभियान कहीं न कहीं इस बात का संकेत भी है कि सामान्य प्रशासनिक व्यवस्था अपेक्षित परिणाम देने में पूरी तरह सफल नहीं रही।

इतिहास भी यही बताता है कि यह पहला ऐसा अभियान नहीं है। इससे पहले भी अलग-अलग सरकारें और उनके नुमाइंदे जनता के बीच प्रशासन ले जाने के कई प्रयोग कर चुके हैं। बड़े-बड़े दावे हुए, शिविर लगे, समीक्षा बैठकें हुईं और सफलता के आंकड़े भी पेश किए गए। लेकिन अभियान समाप्त होते ही व्यवस्था फिर पुराने ढर्रे पर लौट आई। नतीजा वही ‘ढाक के तीन पात’।

अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि अभियान में किसी भी स्तर पर लापरवाही न हो और लंबित मामलों का समयबद्ध निराकरण सुनिश्चित किया जाए। यह स्वागतयोग्य है। लेकिन प्रशासन केवल निर्देशों से नहीं बदलता, बल्कि जवाबदेही और निरंतर निगरानी से बदलता है। यदि अधिकारी केवल पोर्टल पर लंबित मामलों की संख्या कम करने या लक्ष्य पूरा करने की होड़ में लगे रहे, तो यह अभियान भी आंकड़ों की बाजीगरी बनकर रह जाएगा। अभियान की सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि यह केवल औपचारिकता न बने। नामांतरण, बंटवारा, खसरे में सुधार, सीएम हेल्पलाइन, राशन, आवास, स्कूल, अस्पताल और आंगनवाड़ी जैसी मूलभूत सेवाओं में सुधार तभी दिखेगा, जब शिविर खत्म होने के बाद भी वही संवेदनशीलता बनी रहे। जनता को एक दिन का समाधान नहीं, बल्कि स्थायी व्यवस्था चाहिए।

सरकार को यह भी समझना होगा कि जन विश्वास किसी आदेश, पोस्टर या शिविर से नहीं बनता। विश्वास तब पैदा होता है जब नागरिक को बिना सिफारिश, बिना रिश्वत और बिना बार-बार दफ्तरों के चक्कर लगाए न्याय और सेवा मिले।
मुख्यमंत्री जन विश्वास अभियान सरकार के लिए अवसर भी है और परीक्षा भी। यदि यह अभियान प्रशासन की कार्यशैली में स्थायी बदलाव ला सका, तो यह सुशासन की मिसाल बन सकता है। लेकिन यदि यह भी केवल उद्घाटन, निरीक्षण, तस्वीरों और प्रेस विज्ञप्तियों तक सीमित रहा, तो जनता इसे एक और सरकारी कर्मकांड मानने में देर नहीं लगाएगी। आखिरकार, जन विश्वास भाषणों से नहीं, व्यवस्था के व्यवहार से अर्जित होता है। नीयत बदलने और जवाबदेही तय करने से होगा।

-मिलिंद ठाकरे

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