मप्र की भाजपा सरकार ने अपने कार्यकाल के ढाई साल पूरे होने से पहले जिस तरह मंत्रियों का परफॉर्मेंस टेस्ट लिया है, वह केवल एक प्रशासनिक समीक्षा नहीं, बल्कि सत्ता और संगठन के बदलते समीकरणों का बड़ा संकेत भी है। मुख्यमंत्री आवास में कई घंटे चली इस मैराथन बैठकों ने यह स्पष्ट कर दिया कि अब केवल विभागीय कामकाज ही नहीं, बल्कि राजनीतिक सक्रियता, संगठन से तालमेल और जनता के बीच उपस्थिति भी मंत्री पद बचाने की अनिवार्य शर्त बन चुकी है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, भाजपा के राष्ट्रीय सह संगठन महामंत्री शिवप्रकाश, प्रदेश प्रभारी डॉ. महेंद्र सिंह और प्रदेशाध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल की मौजूदगी में हुई यह समीक्षा कई मायनों में असाधारण रही। मंत्रियों से बंद कमरे में सवाल-जवाब होना और पहले से प्रश्नावली भरवाना इस बात का संकेत है कि भाजपा अब केवल सरकारी उपलब्धियों के भरोसे नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रदर्शन के आधार पर भी आगामी रणनीति तय करना चाहती है। दरअसल, भाजपा अच्छी तरह समझती है कि चुनाव केवल योजनाओं और घोषणाओं से नहीं जीते जाते। जनता के बीच सक्रियता, कार्यकर्ताओं से संवाद और संगठन के साथ समन्वय ही किसी सरकार की वास्तविक ताकत होते हैं। यही कारण है कि कई मंत्रियों से यह भी पूछा गया कि वे कितनी बार जिलों में गए, कार्यकर्ताओं से कितनी बैठकें कीं और स्थानीय मुद्दों पर उनकी क्या भूमिका रही। यह कवायद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि लंबे समय तक सत्ता में रहने के बाद सरकारों में आत्मसंतुष्टि और प्रशासनिक दूरी बढ़ने लगती है। भाजपा नेतृत्व शायद इसी खतरे को समय रहते पहचान चुका है। यही वजह है कि अब सिर्फ मंत्री होना पर्याप्त नहीं माना जा रहा, बल्कि राजनीतिक रूप से सक्रिय मंत्री की अवधारणा को आगे बढ़ाया जा रहा है।
-मिलिंद ठाकरे

