मप्र के करीब डेढ़ लाख शिक्षकों के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) अनिवार्य करने संबंधी सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि देश की शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि बच्चों के भविष्य और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से कोई समझौता नहीं किया जा सकता। वर्षों से यह बहस चलती रही है कि लंबे समय से सेवा दे रहे शिक्षकों को टीईटी जैसी परीक्षा से छूट मिलनी चाहिए या नहीं। शिक्षक संगठनों का तर्क है कि कई शिक्षक दशकों से पढ़ा रहे हैं और उनकी कार्यक्षमता को एक परीक्षा के आधार पर नहीं आंका जा सकता। यह तर्क अपनी जगह उचित लग सकता है, लेकिन शिक्षा के बदलते स्वरूप और नई शिक्षण पद्धतियों को देखते हुए समय-समय पर योग्यता का आकलन भी आवश्यक है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में बच्चों के हित को सर्वोपरि माना है। वास्तव में शिक्षा का केंद्र शिक्षक नहीं, बल्कि विद्यार्थी होता है। यदि किसी शिक्षक से अपेक्षा की जाती है कि वह नई पीढ़ी को बेहतर ज्ञान, कौशल और मूल्य प्रदान करे, तो उसके लिए न्यूनतम पात्रता मानकों का पालन करना भी जरूरी है। टीईटी उसी मानक का प्रतीक है। हालांकि अदालत ने मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए शिक्षकों को राहत भी दी है। पहले जहां टीईटी पास करने के लिए दो वर्ष का समय निर्धारित था, वहीं अब इसे बढ़ाकर तीन वर्ष कर दिया गया है। साथ ही राज्यों को वर्ष में दो बार परीक्षा आयोजित करने के निर्देश देकर पर्याप्त अवसर सुनिश्चित किए गए हैं। यह संतुलित दृष्टिकोण है, जिसमें शिक्षा की गुणवत्ता और शिक्षकों की व्यावहारिक कठिनाइयों दोनों का ध्यान रखा गया है। शिक्षक संगठनों की नाराजगी स्वाभाविक है, लेकिन उन्हें इसे दंडात्मक नहीं बल्कि पेशेवर विकास के अवसर के रूप में देखना चाहिए। आज जब हर क्षेत्र में कौशल उन्नयन आवश्यक हो गया है, तब शिक्षा क्षेत्र इससे अछूता नहीं रह सकता। सच तो यह है कि एक योग्य शिक्षक ही एक सक्षम समाज और सशक्त राष्ट्र की नींव रखता है। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला उसी नींव को और मजबूत करने का प्रयास है। अब जरूरत इस बात की है कि सरकारें, शिक्षक संगठन और शिक्षण संस्थान टकराव की बजाय सहयोग का रास्ता अपनाएं, ताकि देश के करोड़ों बच्चों को बेहतर शिक्षा का अधिकार वास्तव में मिल सके।
-मिलिंद ठाकरे

