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बदहाल व्यवस्थाएं, पढ़ाई से विमुख होती बेटियां

मासिक धर्म (पीरियड्स) कोई बीमारी नहीं, बल्कि प्रकृति की सामान्य प्रक्रिया है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि आज भी मप्र की हजारों बेटियों के लिए पीरियड्स शिक्षा के रास्ते की सबसे बड़ी बाधा बने हुए हैं। कारण सिर्फ सामाजिक संकोच नहीं, बल्कि स्कूलों में साफ शौचालय, पानी और बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। नीति आयोग की ताजा रिपोर्ट ने इस गंभीर सच को उजागर किया है कि प्रदेश में माध्यमिक स्तर पर 16.8 प्रतिशत छात्राएं स्कूल छोड़ रही हैं और इसके पीछे मासिक धर्म स्वच्छता एक बड़ी वजह है। यह स्थिति केवल आंकड़ों की कहानी नहीं, बल्कि उन बेटियों के टूटते सपनों की तस्वीर है जो हर महीने असुविधा, शर्म और असुरक्षा के बीच पढ़ाई से दूर हो जाती हैं। रिपोर्ट बताती है कि प्रदेश के करीब 11 प्रतिशत स्कूलों में आज भी छात्राओं के लिए शौचालय नहीं हैं। जहां शौचालय हैं भी, वहां पानी, सफाई, डिस्पोजल सिस्टम और प्राइवेसी जैसी जरूरी व्यवस्थाएं नहीं मिलतीं। ऐसे माहौल में किशोरियों का स्कूल से दूरी बनाना स्वाभाविक है। भोपाल एम्स और जीएमसी के सर्वे में सामने आया कि आधे से ज्यादा छात्राएं पीरियड्स के दौरान स्कूल नहीं जातीं। दाग लगने का डर, सामाजिक झिझक, दर्द और आराम की सुविधा का अभाव उन्हें हर महीने कई दिन पढ़ाई से दूर कर देता है। यह केवल स्वास्थ्य या स्वच्छता का विषय नहीं, बल्कि शिक्षा और समान अवसर का प्रश्न है। विडंबना यह है कि सरकारें करोड़ों खर्च कर स्कूल भवन तो बना रही हैं, लेकिन बेटियों की गरिमा और जरूरतों को अब भी प्राथमिकता नहीं मिल रही। किसी भी स्कूल में छात्राओं के लिए चार बुनियादी सुविधाएं-साफ इंडियन टॉयलेट, पानी का नल, मग्गा और सैनिटरी पैड डिस्पोजल की व्यवस्था अनिवार्य होनी चाहिए। यह कोई बड़ी मांग नहीं, बल्कि न्यूनतम संवेदनशीलता है। जरूरत केवल ढांचागत सुधार की नहीं, बल्कि सोच बदलने की भी है। मासिक धर्म पर खुलकर संवाद, शिक्षकों की संवेदनशीलता और समाज की जागरूकता जरूरी है। यदि बेटियां हर महीने असुविधा और शर्म के कारण स्कूल छोड़ने को मजबूर हों, तो यह किसी भी विकसित समाज के लिए चिंता का विषय है। शिक्षा का अधिकार तभी सार्थक होगा, जब स्कूल बेटियों के लिए सुरक्षित, सम्मानजनक और संवेदनशील बनेंगे।

-मिलिंद ठाकरे

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