मप्र में बढ़ता सरकारी कर्ज अब केवल वित्तीय आंकड़ों तक सीमित विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह राज्य की आर्थिक नीतियों और भविष्य की विकास दिशा पर गंभीर बहस का मुद्दा बन चुका है। प्रदेश पर करीब पांच लाख करोड़ रुपए का कर्ज होना और हर नागरिक पर औसतन 55 हजार रुपए की देनदारी इस बात का संकेत है कि सरकार की वित्तीय जिम्मेदारियां तेजी से बढ़ रही हैं। सवाल यह नहीं है कि सरकार जनकल्याणकारी योजनाएं क्यों चला रही है, बल्कि यह है कि क्या इन योजनाओं और आर्थिक स्थिरता के बीच संतुलन बनाए रखने की पर्याप्त तैयारी भी की जा रही है या नहीं? पिछले कुछ वर्षों में प्रदेश सरकार ने लाड़ली बहना योजना, किसान सम्मान निधि, सामाजिक सुरक्षा पेंशन और विभिन्न सहायता योजनाओं के जरिए समाज के बड़े वर्ग को सीधे आर्थिक लाभ पहुंचाने का प्रयास किया है। राजनीतिक दृष्टि से ये योजनाएं बेहद प्रभावी रही हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में नकदी प्रवाह बढ़ा, महिलाओं की आर्थिक भागीदारी मजबूत हुई और गरीब तबकों को तत्काल राहत मिली। लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसी योजनाओं की उपयोगिता से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन दूसरी तरफ यह भी सच है कि इन योजनाओं का वित्तीय बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। सरकार को विकास कार्यों के साथ-साथ पुराना कर्ज चुकाने और उसके ब्याज भुगतान के लिए भी भारी राशि खर्च करनी पड़ रही है। जब बजट का बड़ा हिस्सा ब्याज और कर्ज अदायगी में जाने लगे, तब शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और आधारभूत संरचना जैसे क्षेत्रों के लिए संसाधन सीमित होने लगते हैं। यही स्थिति किसी भी राज्य की आर्थिक सेहत के लिए चिंता का कारण बनती है। दरअसल, समस्या कर्ज लेने में नहीं बल्कि कर्ज की गति और उसके उपयोग में है। यदि लिया गया ऋण उद्योग, निवेश, रोजगार और उत्पादन क्षमता बढ़ाने में लगे तो वह भविष्य की आय का स्रोत बनता है। लेकिन यदि कर्ज का बड़ा हिस्सा केवल उपभोग आधारित योजनाओं में खर्च हो, तो लंबे समय में वित्तीय दबाव बढ़ने लगता है। इसलिए सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती जनहित और आर्थिक अनुशासन के बीच संतुलन बनाने की भी है। मप्र जैसे बड़े और विकासशील राज्य के लिए अब केवल लोकलुभावन घोषणाएं पर्याप्त नहीं होंगी। प्रदेश को उद्योग निवेश, रोजगार सृजन, कृषि आधारित प्रोसेसिंग, निर्यात और कर संग्रह बढ़ाने जैसी दीर्घकालिक रणनीतियों पर गंभीरता से काम करना होगा। साथ ही योजनाओं की समीक्षा, खर्चों में पारदर्शिता और वित्तीय प्राथमिकताओं का पुनर्मूल्यांकन भी जरूरी है। नागरिक कल्याण लोकतंत्र की आवश्यकता है, लेकिन आर्थिक स्थिरता उसकी बुनियाद है। यदि यह संतुलन बिगड़ा तो आने वाले वर्षों में विकास की गति और सरकारी वित्त दोनों पर दबाव बढ़ सकता है। इसलिए अब समय भावनात्मक राजनीति से आगे बढ़कर आर्थिक दूरदर्शिता दिखाने का है।
-मिलिंद ठाकरे

