बालाघाट: जिले के किरनापुर विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत सेवती के ग्राम गुलवा स्थित शासकीय प्राथमिक शाला में शिक्षकों की कमी का मामला सामने आया है। स्कूल में कक्षा पहली से पांचवीं तक के बच्चों की पढ़ाई की जिम्मेदारी वर्तमान में एक ही शिक्षिका के भरोसे है। इससे बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होने की चिंता जताते हुए पालकों ने जिला मुख्यालय स्थित जनसुनवाई केंद्र में कलेक्टर के नाम आवेदन सौंपकर समस्या के निराकरण की मांग की है।
पालकों के अनुसार, शासकीय प्राथमिक शाला गुलवा में सुरजलाल सोनवाने और भूमिका ठाकरे दो शिक्षक पदस्थ हैं। इनमें से सुरजलाल सोनवाने जनवरी 2020 से जनशिक्षा केंद्र हिरी में कार्यवाहक जनशिक्षक के रूप में सेवाएं दे रहे हैं। उनके स्कूल में वापस आने की मांग को लेकर पालक वर्ष 2020 से लगातार प्रयास कर रहे हैं, लेकिन अब तक समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो पाया है।
छह वर्षों में बदले पांच शिक्षक
पालकों ने आवेदन में बताया कि वर्ष 2020 से जनवरी 2026 तक शैक्षणिक व्यवस्था के तहत अन्य स्कूलों से पांच शिक्षक-शिक्षिकाओं को गुलवा स्कूल में भेजा गया, लेकिन बार-बार शिक्षकों के बदलने से बच्चों की पढ़ाई पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। उनका कहना है कि शिक्षकों की निरंतरता नहीं होने के कारण बच्चों की शिक्षा प्रभावित हो रही है और उनकी शैक्षणिक नींव कमजोर होने की आशंका है।
पालकों के मुताबिक, अप्रैल 2026 से स्कूल में कक्षा पहली से पांचवीं तक की पढ़ाई केवल शिक्षिका भूमिका ठाकरे द्वारा कराई जा रही है। ऐसे में एक ही शिक्षिका पर पांच कक्षाओं के विद्यार्थियों को पढ़ाने की जिम्मेदारी होने से बच्चों को पर्याप्त शैक्षणिक मार्गदर्शन मिल पाने को लेकर पालक चिंतित हैं।
तीन बार आवेदन देने के बाद भी निराकरण नहीं होने का आरोप
पालकों ने आरोप लगाया कि वे इस समस्या को लेकर जनसुनवाई में पहले भी आवेदन दे चुके हैं। उनके अनुसार, तीन बार शिकायत और आवेदन प्रस्तुत करने के बावजूद अब तक समस्या का निराकरण नहीं हुआ है। इससे नाराज पालकों ने एक बार फिर प्रशासन से हस्तक्षेप कर स्कूल में नियमित शिक्षक की व्यवस्था सुनिश्चित करने की मांग की है।
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सोनवाने के स्थानांतरण की मांग
कलेक्टर को सौंपे गए आवेदन में पालकों ने मांग की है कि सुरजलाल सोनवाने का स्थानांतरण किया जाए, ताकि उनके स्थान पर किसी नियमित शिक्षक की पदस्थापना हो सके और बच्चों की पढ़ाई सुचारु रूप से संचालित हो। पालकों का कहना है कि गांव के अधिकांश बच्चे गरीब परिवारों से आते हैं और सरकारी स्कूल ही उनकी शिक्षा का प्रमुख सहारा है। ऐसे में स्कूल में पर्याप्त शिक्षकों की व्यवस्था करना जरूरी है।

