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मोहन सरकार में दोनों डिप्टी सीएम की भूमिका पर उठे सवाल, तीन घटनाओं से बढ़ी सियासी हलचल

भोपाल: मध्य प्रदेश की मोहन यादव सरकार में इन दिनों कुछ ऐसे घटनाक्रम सामने आए हैं, जिनसे भाजपा के भीतर सत्ता और प्रशासनिक फैसलों को लेकर सवाल उठने लगे हैं। उपमुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा और राजेंद्र शुक्ल से जुड़े तीन अलग-अलग मामलों के बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि क्या सरकार में दोनों उपमुख्यमंत्रियों का प्रभाव कम हो रहा है। हालांकि, इन घटनाओं से दोनों नेताओं को जानबूझकर किनारे किए जाने की पुष्टि नहीं होती।

नई गाड़ियों का प्रस्ताव खारिज होने से उठे सवाल

सबसे पहले दोनों उपमुख्यमंत्रियों के लिए नई गाड़ियां खरीदने का प्रस्ताव खारिज होने का मामला सामने आया। बताया गया कि वित्त विभाग ने बजट की कमी का हवाला देते हुए नई इनोवा गाड़ियां खरीदने की अनुमति नहीं दी। विभाग की ओर से पुराने वाहनों की मरम्मत कराकर इस्तेमाल करने की बात कही गई।

वहीं, मुख्यमंत्री सहित कुछ अन्य अधिकारियों और मंत्रियों के लिए नई गाड़ियां खरीदे जाने की बात भी सामने आई है। इसी अंतर को लेकर सवाल उठ रहे हैं। बताया जा रहा है कि उपमुख्यमंत्रियों की मौजूदा गाड़ियां एक लाख दस हजार किलोमीटर से ज्यादा चल चुकी हैं।

प्रदेश पर करीब 5.65 लाख करोड़ रुपए से अधिक कर्ज होने के बीच सरकारी खर्चों को लेकर भी चर्चा हो रही है।

कोर ग्रुप की बैठक की बातें बाहर आने पर नाराजगी

दूसरा मामला उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल से जुड़ा है। रीवा में भाजपा कोर ग्रुप की बंद कमरे में हुई बैठक की बातें सार्वजनिक होने पर उन्होंने नाराजगी जताई।

शुक्ल ने कहा कि पार्टी की महत्वपूर्ण बैठकों में होने वाली गोपनीय चर्चा बाहर नहीं जानी चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि जो लोग अंदर की बातें सार्वजनिक करते हैं, उन्हें भविष्य में ऐसी बैठकों में शामिल होने का अवसर नहीं मिलना चाहिए।

इस घटनाक्रम के बाद पार्टी के भीतर गोपनीयता और आपसी विश्वास को लेकर चर्चा शुरू हो गई है।

जगदीश देवड़ा के पूर्व ओएसडी के निलंबन से बढ़ी चर्चा

तीसरा मामला उपमुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा के तत्कालीन विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी (OSD) दीपम रायचुरा से जुड़ा है।

भोपाल में दो शराब दुकानों के ठेके के लिए करीब पौने तीन करोड़ रुपए की कथित फर्जी एफडीआर इस्तेमाल करने के मामले में रायचुरा पर आरोप लगे हैं। जानकारी के अनुसार, उन्हें 9 अक्टूबर को ओएसडी पद से हटाया गया और 12 अक्टूबर को निलंबन आदेश जारी हुआ।

मामले में एक करोड़ रुपए की कथित रिश्वत से जुड़ी बात भी सामने आई है। हालांकि, आरोपों की अंतिम पुष्टि जांच और कानूनी प्रक्रिया के बाद ही हो सकेगी।

इस मामले पर जगदीश देवड़ा ने कहा कि उन्हें इसकी जानकारी समाचार पत्रों के माध्यम से मिली थी।

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शिवराज के बयान से भी गरमाई प्रदेश की राजनीति

इसी बीच पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान के एक बयान ने भी राजनीतिक चर्चा बढ़ा दी है। सीहोर में आदिवासी परिवारों के मकानों पर बुलडोजर कार्रवाई को लेकर उन्होंने अधिकारियों के रवैये पर सवाल उठाए।

इसके बाद कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने सरकार पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री मोहन यादव के पीछे शिवराज सिंह चौहान का प्रभाव काम कर रहा है। कांग्रेस ने इसे रिमोट कंट्रोल की राजनीति से जोड़कर देखा है। हालांकि, यह विपक्ष का राजनीतिक आरोप है। इन घटनाओं के बीच सवाल उठ रहा है कि सरकार में प्रशासनिक फैसलों और राजनीतिक नेतृत्व के बीच तालमेल किस तरह आगे बढ़ेगा।

मुख्यमंत्री मोहन यादव के सामने एक ओर प्रदेश की आर्थिक स्थिति को संभालने की चुनौती है, तो दूसरी ओर वरिष्ठ सहयोगियों के साथ बेहतर समन्वय बनाए रखने की जिम्मेदारी भी है। आने वाले दिनों में सरकार के फैसलों और भाजपा नेताओं के रुख से यह स्पष्ट हो सकेगा कि ये घटनाएं सामान्य प्रशासनिक प्रक्रियाओं का हिस्सा हैं या इनके पीछे कोई बड़ा राजनीतिक मतभेद भी है।

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