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सरदार सरोवर समझौता: फायदा मप्र को, फिर विरोध किसलिए?

सरदार सरोवर परियोजना को लेकर मप्र और गुजरात के बीच तीन दशक से लंबित वित्तीय विवाद का समाधान अब राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का दावा है कि नए समझौते से प्रदेश को 1268 करोड़ रुपये की बचत हुई है। यदि यह दावा सही है, तो स्वाभाविक सवाल उठता है कि आखिर कांग्रेस इस समझौते का विरोध किस आधार पर कर रही है?सरकार के अनुसार, भारत के अटॉर्नी जनरल द्वारा सुझाए गए फार्मूले के तहत मध्य प्रदेश पर लगभग 1500 करोड़ रुपये की देनदारी बन रही थी। लेकिन चार राज्यों के बीच सर्वसम्मति से तय नए फार्मूले के बाद यह राशि घटकर 231.80 करोड़ रुपये रह गई। यानी प्रदेश के खजाने पर पड़ने वाला संभावित वित्तीय बोझ काफी कम हो गया। किसी भी दृष्टि से इसे राहत ही माना जाएगा। कांग्रेस का तर्क है कि जिस मप्र ने अपनी भूमि, जंगल और हजारों परिवारों के विस्थापन का सबसे बड़ा बोझ उठाया, उसे गुजरात को एक रुपया भी नहीं देना चाहिए था। यह राजनीतिक और नैतिक तर्क हो सकता है, लेकिन यदि कानूनी और वित्तीय स्थिति ऐसी थी कि भुगतान अपरिहार्य था, तब यह भी देखना होगा कि सरकार ने उस दायित्व को कितना कम कराया।
यहीं सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है। यदि सरकार का दावा तथ्यात्मक रूप से सही है कि 1500 करोड़ रुपये की संभावित देनदारी घटकर 231.80 करोड़ रुपये रह गई, तो कांग्रेस को यह स्पष्ट करना चाहिए कि उसका वैकल्पिक समाधान क्या था। क्या वह इस भुगतान को पूरी तरह समाप्त करा सकती थी या इससे भी बेहतर समझौता संभव था? केवल विरोध दर्ज कराना पर्याप्त नहीं होता, उसके पीछे ठोस तथ्य और व्यवहारिक विकल्प भी होने चाहिए।
बेशक, सरकार के दावों की जांच होना जरूरी है। विपक्ष का यह अधिकार भी है कि वह समझौते की शर्तों और वित्तीय गणना पर सवाल उठाए। लेकिन सरकार की भी जिम्मेदारी है कि वह पूरे समझौते को सार्वजनिक कर यह स्पष्ट करे कि प्रदेश को वास्तविक लाभ किस आधार पर मिला। अंततः यह मुद्दा राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से कहीं बड़ा है। यदि मध्य प्रदेश को वास्तव में 1268 करोड़ रुपये का वित्तीय लाभ हुआ है, तो यह प्रदेश के हित में माना जाएगा। और यदि इस दावे में कोई तथ्यात्मक कमी है, तो उसे दस्तावेजों और प्रमाणों के साथ सामने लाया जाना चाहिए। लोकतंत्र में सबसे बड़ा हित किसी दल का नहीं, बल्कि जनता और प्रदेश के संसाधनों का होता है।

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