उज्जैन। शारदीय नवरात्रि की नवमी तिथि पर सोमवार, 19 अक्टूबर को मां दुर्गा के नौवें स्वरूप मां सिद्धिदात्री की पूजा-अर्चना की जाएगी। देवी दुर्गा के इस स्वरूप को सिद्धियों की अधिष्ठात्री माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां सिद्धिदात्री की आराधना से साधक को ज्ञान, विवेक, आध्यात्मिक उन्नति और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है। नवरात्रि की महानवमी पर देवी पूजन के साथ हवन, दुर्गा सप्तशती के पाठ और कन्या पूजन की भी परंपरा है। आइए जानते हैं मां सिद्धिदात्री का स्वरूप, पूजा का महत्व, शास्त्रोक्त विधान, मंत्र और भोग।
मां सिद्धिदात्री का स्वरूप
मार्कण्डेय पुराण में वर्णित नवदुर्गा की परंपरा के अनुसार, मां सिद्धिदात्री देवी दुर्गा का नौवां स्वरूप हैं। उनका नाम ही सिद्धियां प्रदान करने वाली देवी का बोध कराता है।
देवी की चार भुजाएं हैं। उनके दाहिने हाथों में चक्र और गदा तथा बाएं हाथों में शंख और कमल सुशोभित हैं। उन्हें कमल के आसन पर विराजमान और सिंह पर आरूढ़ स्वरूप में भी दर्शाया जाता है। देवी का यह स्वरूप शक्ति, ज्ञान और सिद्धि का प्रतीक माना जाता है।
धार्मिक मान्यता है कि मां सिद्धिदात्री की कृपा से भगवान शिव को सिद्धियां प्राप्त हुईं। देवी की शक्ति से भगवान शिव का आधा शरीर देवी का हुआ, जिसके बाद वे अर्द्धनारीश्वर कहलाए। यह स्वरूप शिव और शक्ति की अभिन्नता का प्रतीक है।
मां सिद्धिदात्री की पूजा का महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां सिद्धिदात्री आठ सिद्धियां और नौ निधियां प्रदान करने वाली देवी हैं। उनकी उपासना से साधक को आध्यात्मिक उन्नति, विवेक और आत्मज्ञान की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती है।
महानवमी को नवरात्रि साधना की पूर्णता का विशेष अवसर माना जाता है। इस दिन श्रद्धालु देवी की पूजा, मंत्र-जप और हवन करके परिवार की सुख-शांति तथा कल्याण की कामना करते हैं।
नवमी पर कन्या पूजन का भी विशेष महत्व है। कन्याओं को देवी का स्वरूप मानकर उनका सम्मान, पूजन और भोजन कराने की परंपरा शक्ति की आराधना तथा नारी सम्मान का संदेश देती है।
मां सिद्धिदात्री की शास्त्रोक्त पूजा विधि
1. स्नान और संकल्प: प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल को साफ कर मां सिद्धिदात्री का ध्यान करें और अपनी सामर्थ्य के अनुसार व्रत तथा पूजा का संकल्प लें।
2. देवी का आवाहन: पूजा में प्रचलित परंपरा के अनुसार कलश, गणेश और अन्य पूज्य देवताओं का स्मरण करें। इसके बाद मां सिद्धिदात्री का ध्यान करके पुष्प अर्पित करें।
3. षोडशोपचार या पंचोपचार पूजन: देवी को रोली, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें। विस्तृत पूजा करने वाले श्रद्धालु अपनी परंपरा के अनुसार गंध, वस्त्र, आभूषण, फल और अन्य उपचार भी समर्पित कर सकते हैं।
4. मंत्र-जप और स्तुति: मां सिद्धिदात्री के ध्यान मंत्र का जप करें। दुर्गा सप्तशती का पाठ करने वाले साधक अपनी परंपरा के अनुसार पाठ का समापन करें।
5. भोग और आरती: देवी को फल, नारियल, खीर, हलवा या अन्य सात्त्विक पकवान अर्पित करें। इसके बाद मां की आरती करें और परिवार के कल्याण की प्रार्थना करें।
6. हवन: नवरात्रि की नवमी पर हवन करने की परंपरा है। श्रद्धालु अपनी कुल-परंपरा और पुरोहित के मार्गदर्शन के अनुसार हवन करें। दुर्गा सप्तशती के पाठ के साथ हवन करने वाले साधक संबंधित विधान का पालन करें।
7. कन्या पूजन: परंपरा के अनुसार नौ कन्याओं को आमंत्रित कर उनका सम्मान करें, भोजन कराएं और सामर्थ्य के अनुसार दक्षिणा या उपहार दें। कई परिवारों में कन्या पूजन के साथ बटुक भैरव के प्रतीक रूप में एक बालक को भी भोजन कराने की परंपरा है। यह प्रथा क्षेत्र और परिवार की मान्यता के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।
मां सिद्धिदात्री का ध्यान मंत्र
नवदुर्गा की प्रचलित स्तुति में मां सिद्धिदात्री का ध्यान इस मंत्र से किया जाता है-
सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि।
सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी॥
इस मंत्र में देवी से सिद्धि प्रदान करने वाली तथा देवताओं, यक्षों और अन्य दिव्य शक्तियों द्वारा सेवित कल्याणकारी शक्ति के रूप में प्रार्थना की गई है।
मां सिद्धिदात्री का बीज मंत्र
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं सिद्धिदात्र्यै नमः॥
श्रद्धालु इस मंत्र का अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार जप कर सकते हैं। मंत्र-जप के दौरान मन को शांत रखकर देवी का ध्यान करना महत्वपूर्ण माना जाता है।
मां सिद्धिदात्री को क्या भोग लगाएं?
मां सिद्धिदात्री को फल, नारियल, खीर, हलवा और अन्य सात्त्विक पकवान अर्पित किए जा सकते हैं। नवमी पर हलवा, पूरी और चने का भोग लगाने तथा उसे कन्याओं और परिवार के सदस्यों में प्रसाद के रूप में बांटने की परंपरा प्रचलित है। भोग में क्षेत्रीय और पारिवारिक परंपराओं के अनुसार अंतर हो सकता है।

