दिल्ली: कॉकरोच जनता पार्टी के नेता सौरव दास और आशुतोष रांका ने हिरासत बढ़ाने के खिलाफ हाईकोर्ट में दायर अपनी याचिका वापस ले ली है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट के आदेश को चुनौती देने के लिए रिवीजन पिटीशन का विकल्प मौजूद है।
हिरासत की अवधि बढ़ाए जाने के खिलाफ सौरव दास और आशुतोष रांका ने हाईकोर्ट का रुख किया था। हालांकि, सुनवाई के दौरान कोर्ट ने उन्हें उचित कानूनी प्रक्रिया अपनाने की बात कही।
कोर्ट के मुताबिक, मजिस्ट्रेट के आदेश को चुनौती देने के लिए रिवीजन पिटीशन दायर की जा सकती है। इसके बाद दोनों नेताओं ने अपनी याचिका वापस ले ली।
कोर्ट ने क्या कहा?
कोर्ट ने कहा कि जब मजिस्ट्रेट के आदेश को चुनौती देने के लिए रिवीजन पिटीशन का विकल्प है, तो सीधे अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट आने की जरूरत क्यों पड़ी? जब किसी आदेश को चुनौती देने के लिए कानून में अलग रास्ता है तो पहले उस रास्ते का इस्तेमाल करना चाहिए।
इसलिए कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं से मौजूदा याचिका वापस लेकर रिवीजन पिटीशन लगाने को कहा। इसके बाद सौरव दास और आशुतोष रांका ने अपनी याचिकाएं वापस ले लीं।
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अनुच्छेद 226 और रिवीजन पिटीशन में फर्क
अगर किसी व्यक्ति को लगता है कि उसके अधिकारों का उल्लंघन हुआ है या किसी सरकारी अथॉरिटी ने गलत कानूनी कार्रवाई की है तो वह हाईकोर्ट में अनुच्छेद 226 के तहत याचिका लगा सकता है।
जबकि रिवीजन में निचली अदालत के आदेश को कानूनी आधार पर चुनौती देने का विकल्प होता है। इस मामले में निचली अदालत ने फैसला दिया था, इसलिए उसके रिवीजन की ही पिटीशन पहले दायर की जानी थी।
बता दें, 10 अक्टूबर को प्रदर्शन से पहले सौरव दास और आशुतोष रांका को हिरासत में लिया गया था। दोनों को इस शर्त पर जमानत मिली थी कि वे शांति भंग नहीं करेंगे।
12 अक्टूबर को सरकार ने जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटा दिया। इसके बावजूद 13 अक्टूबर को दोनों नेता तिरंगा लेकर जंतर-मंतर पहुंचे, जिसके बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।
14 अक्टूबर को मजिस्ट्रेट कोर्ट ने दोनों को 5 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया। 19 अक्टूबर को हिरासत की अवधि खत्म होने पर उनकी कस्टडी 2 दिन के लिए और बढ़ा दी गई। दोनों ने हिरासत बढ़ाने के इसी आदेश को आर्टिकल 226 के तहत हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

