नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाते हुए कहा है कि पत्नी को ‘बेवकूफ’ और ‘निकम्मा’ कहना अपने आप में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A के तहत क्रूरता का अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसी आधार पर अदालत ने पत्नी की आत्महत्या के मामले में पति के खिलाफ दर्ज FIR और उससे जुड़ी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।
यह मामला महाराष्ट्र के एक दंपती से जुड़ा है, जो शादी के बाद कनाडा के टोरंटो में रहने लगे थे। जून 2023 में पत्नी ने अपने अपार्टमेंट की 22वीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली थी। इसके बाद महिला के पिता ने पति और उसके परिवार के खिलाफ दहेज प्रताड़ना, मारपीट और मानसिक उत्पीड़न के आरोप लगाते हुए पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी।
शिकायत में आरोप लगाया गया था कि पति अपनी पत्नी के साथ अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करता था और छोटी-छोटी बातों पर उसे डांटता था। मामले में दहेज की मांग और प्रताड़ना के आरोप भी लगाए गए थे।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति मनमोहन की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि केवल पत्नी को ‘स्टूपिड’ और ‘यूजलेस’ कहना अपने आप में आपराधिक क्रूरता या धमकी का आधार नहीं बन सकता। अदालत के मुताबिक, किसी व्यक्ति का गुस्सैल स्वभाव होना और छोटी-छोटी बातों पर डांटना अपने आप में आपराधिक धमकी या गंभीर शारीरिक प्रताड़ना के बराबर नहीं है।
अदालत ने यह भी कहा कि क्रूरता और उत्पीड़न के आरोपों के समर्थन में स्पष्ट घटनाएं और पर्याप्त साक्ष्य होना जरूरी है। केवल सामान्य आरोपों के आधार पर किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मुकदमा जारी रखना उचित नहीं है।
सुसाइड नोट में पति का जिक्र नहीं
सुनवाई के दौरान पत्नी का एक हस्तलिखित सुसाइड नोट भी सामने आया। इसमें महिला ने नौकरी नहीं मिलने और लंबे समय से संघर्ष करने के कारण खुद को असफल महसूस करने की बात लिखी थी। अदालत ने नोट में पति या उसके परिवार के खिलाफ किसी आरोप का उल्लेख नहीं पाया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उपलब्ध सामग्री से पति और उसके परिवार पर लगाए गए दहेज प्रताड़ना के आरोपों की पुष्टि नहीं होती। साथ ही, पत्नी की आत्महत्या और पति के कथित व्यवहार के बीच ऐसा कोई ठोस संबंध भी सामने नहीं आया, जिसके आधार पर आपराधिक जिम्मेदारी तय की जा सके।
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हाईकोर्ट का आदेश भी रद्द
सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश को भी रद्द कर दिया, जिसमें पति के परिवार के अन्य सदस्यों को राहत दी गई थी, लेकिन पति के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही जारी रखने की अनुमति दी गई थी। शीर्ष अदालत ने पति के खिलाफ दर्ज FIR और उससे जुड़ी सभी आपराधिक कार्यवाहियों को समाप्त कर दिया।
हालांकि, इस फैसले का मतलब यह नहीं है कि वैवाहिक जीवन में मानसिक प्रताड़ना, अपमान या दुर्व्यवहार को कानून की नजर में अपराध नहीं माना जाएगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में आरोपों की प्रकृति, घटनाओं की गंभीरता और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर निर्णय लिया जाना चाहिए।

