नई दिल्ली। अमेरिकी टैरिफ में भारी कटौती भारतीय बाजार के लिए बूस्टर डोज साबित होने वाली है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से न केवल निर्यात के रिकॉर्ड टूटेंगे, बल्कि विदेशी निवेशकों का भरोसा लौटने से रुपया भी अपनी खोई हुई मजबूती वापस पा सकेगा।
भारत-अमेरिका के बीच हुए टैरिफ समझौते ने भारतीय उद्योग जगत में उत्साह की लहर दौड़ानी शुरू कर दी है। आर्थिक विश्लेषकों के अनुसार, 50 प्रतिशत के भारी टैक्स बोझ का 18 प्रतिशत पर आना सीधे तौर पर भारतीय उत्पादों को अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धी बनाएगा। नुवामा इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज की रिपोर्ट बताती है कि इस राहत का सबसे बड़ा फायदा कपड़ा और रत्न-आभूषण क्षेत्र को होगा, जो रोजगार के लिहाज से भी बेहद महत्वपूर्ण हैं।
हालांकि, यह समझौता ’सिक्के के दो पहलू’ जैसा है। जहाँ एक तरफ निर्यात बढ़ेगा, वहीं दूसरी ओर भारत द्वारा अमेरिकी कृषि और आईटी उत्पादों के लिए अपने बाजार खोलने से घरेलू प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है। विशेषकर कृषि क्षेत्र में, जहाँ भारत का आयात शुल्क वर्तमान में 35-40 प्रतिशत है, वहां कटौती से किसानों के हितों की सुरक्षा एक चुनौती होगी।
बाजार विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस स्थिरता से भारत के विदेशी मुद्रा भंडार और ’पेमेंट बैलेंस’ में सुधार होगा। यदि 500 अरब डॉलर के व्यापारिक सौदे धरातल पर उतरते हैं, तो भारतीय मुद्रा को भारी मजबूती मिलेगी। यह डील केवल करों की कटौती नहीं है, बल्कि यह चीन के विकल्प के रूप में भारत को वैश्विक सप्लाई चेन का केंद्र बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
टैरिफ वार पर विरामः भारतीय उद्योगों के लिए ’अच्छे दिन’, निर्यात और निवेश की राह हुई आसान


