राष्ट्रीय स्वच्छ वायु सर्वेक्षण-2026 में मप्र के इंदौर और जबलपुर को स्वच्छ वायु सराहना पुरस्कार मिलना निश्चित रूप से उपलब्धि है।भोपाल नगर निगम के वार्ड-60 को भी वार्ड स्तरीय नवाचार के लिए सम्मानित किया जा रहा है। लेकिन सवाल पुरस्कार का नहीं, उस हवा का है जिसे शहर का आम नागरिक हर दिन सांस के साथ अपने भीतर उतार रहा है। आखिर सम्मान मिलने के बाद भी क्या शहरों की हवा वास्तव में साफ हो गई है?
राष्ट्रीय हरित अधिकरण के समक्ष प्रस्तुत आंकड़े इस चमकदार तस्वीर की दूसरी कहानी बताते हैं। 2019-20 से 2023-24 के बीच भोपाल में PM10 का वार्षिक औसत 138 से घटकर 110 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर जरूर हुआ, लेकिन यह अब भी निर्धारित मानक से ऊपर है। जबलपुर में यह स्तर 98 से घटकर 89 हुआ, जबकि इंदौर में 86 से बढ़कर 92 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर पहुंच गया। यानी सुधार की कहानी हर शहर में एक जैसी नहीं है। 4 सितंबर की 24 घंटे की निगरानी में इंदौर के छोटी ग्वालटोली स्टेशन पर AQI 57, जबलपुर के मरहताल में 73 और भोपाल के टीटी नगर में 32 दर्ज हुआ। एक दिन के आंकड़े राहत दे सकते हैं, लेकिन इन्हें सालभर की हवा की गारंटी नहीं माना जा सकता।
शहरों में सड़क की धूल अब भी उड़ रही है, निर्माण स्थलों से धूल का गुबार उठ रहा है, वाहन धुआं उगल रहे हैं और कई जगह कचरा खुले में जलाया जा रहा है। ऐसे में पुरस्कारों को उपलब्धि जरूर माना जाना चाहिए, लेकिन उन्हें स्वच्छ हवा की अंतिम कसौटी बना देना आत्मसंतोष होगा। शहरों की असली परीक्षा समारोहों के मंच पर नहीं, सड़कों पर होगी। सम्मान प्रमाणपत्र में दर्ज हो सकता है, लेकिन स्वच्छ हवा का असली प्रमाण तब मिलेगा, जब हर नागरिक बिना प्रदूषण के डर के खुलकर सांस ले सके।
-मिलिंद ठाकरे

