मप्र में शिक्षकों की ई-अटेंडेंस व्यवस्था लागू होने से पहले ही सवालों के घेरे में आ गई है। स्कूल शिक्षा विभाग के ऑनलाइन सहमति पत्र में डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 का उल्लेख किए जाने के बाद शिक्षक संगठनों ने डेटा सुरक्षा और पोर्टल की पारदर्शिता पर सवाल उठाए हैं। सवाल इसलिए अहम है, क्योंकि डिजिटल हाजिरी के नाम पर शिक्षकों का मोबाइल नंबर, लोकेशन और सेवा संबंधी जानकारी डिजिटल सिस्टम में दर्ज होगी। शिक्षक संगठनों का सीधा सवाल है कि जिस कानून का हवाला देकर सहमति ली जा रही है, उसके तहत डेटा के संग्रह, इस्तेमाल, भंडारण और सुरक्षा की व्यवस्था आखिर क्या है?ई-अटेंडेंस 3.0 पोर्टल किस तकनीकी ढांचे पर चल रहा है, डेटा किस सर्वर पर सुरक्षित रखा जा रहा है और यदि किसी निजी कंपनी या थर्ड पार्टी की भूमिका है तो उसकी जिम्मेदारी और पहुंच कितनी है?सरकार को इन सवालों का स्पष्ट जवाब देना चाहिए।
सरकार को संबंधित डिजिटल गाइडलाइंस, साइबर सिक्योरिटी ऑडिट और डेटा सुरक्षा से जुड़ी जानकारी भी सार्वजनिक करनी चाहिए। इससे शिक्षकों का भरोसा बढ़ेगा और तकनीकी व्यवस्था को लेकर उठ रही आशंकाएं दूर होंगी। दूसरा बड़ा सवाल शिकायतों के निराकरण की रफ्तार को लेकर है। परिवेदना पोर्टल के आंकड़ों के मुताबिक 36,827 मामलों में 17,817 प्रकरण लंबित बताए गए हैं। भोपाल में ही 1,824 मामले लंबित होने की जानकारी सामने आई है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि सरकार हाजिरी की निगरानी के लिए तकनीक लागू करने में तेजी दिखा रही है, लेकिन शिक्षकों की समस्याओं के समाधान में वही तत्परता क्यों नहीं दिखाई दे रही?
ई-अटेंडेंस से अनुशासन और जवाबदेही बढ़ सकती है, लेकिन तकनीक का भरोसा तभी कायम होगा जब उसके पीछे पारदर्शिता और जवाबदेही भी हो।शिक्षकों की हाजिरी जरूरी है, मगर उनकी निजता और व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा भी सरकार की उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी है।
-मिलिंद ठाकरे

