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जनमन योजना की अधूरी राहः पुल बिना सड़क बनी, आदिवासियों का सफर आज भी दुश्वार

बालाघाट। जिले के परसवाड़ा अंतर्गत आदिवासी अंचल में बनी देश की पहली ‘जनमन योजना’ सड़क उम्मीदों की नई सुबह लेकर आई थी। लेकिन बिना पुल के यह सड़क अब विकास का प्रतीक कम और प्रशासनिक लापरवाही का उदाहरण अधिक बन गई है, जहां बारिश आते ही जिंदगी की रफ्तार कीचड़ में धँस जाती है।
मध्यप्रदेश के नक्सल प्रभावित बालाघाट जिले के परसवाड़ा क्षेत्र में वर्ष 2024 में प्रधानमंत्री जनजातीय आदिवासी न्याय महाअभियान योजना, यानी ‘जनमन योजना’ के तहत देश की पहली पक्की सड़क बनाई गई थी। उद्देश्य था विशेष पिछड़ी जनजाति बैगा समुदाय को मुख्यधारा से जोड़ना और उन्हें स्वास्थ्य, शिक्षा व राशन जैसी बुनियादी सुविधाओं तक आसान पहुँच देना।
सड़क के उद्घाटन के समय प्रशासनिक अमले ने इसे ऐतिहासिक उपलब्धि बताते हुए खूब सराहना बटोरी। खबरों और मंचों पर तस्वीरें छपीं, बयान दिए गए और दावे हुए कि अब आदिवासी अंचल का भाग्य बदलेगा। पर सच्चाई यह है कि सड़क के रास्ते में पड़ने वाले नालों पर बनने वाले दो पुल आज तक नहीं बन सके।
16 मार्च 2024 को सड़क का निर्माण पूरा हो गया था, लेकिन उसके बाद पुल निर्माण की फाइलें शायद दफ्तरों की अलमारियों में ही दब गईं। नतीजा यह है कि पंडाटोला, नीमटोला और डंडईझोला जैसे गाँवों के लोग आज भी बारिश के चार महीनों में बाहरी दुनिया से कट जाते हैं। उफनते नालों को पार करना बच्चों, गर्भवती महिलाओं, बुज़ुर्गों और बीमारों के लिए जानलेवा चुनौती बन जाता है। कई बार गाँव पूरा टापू बन जाता है, जहां न स्कूल की घंटी पहुंचती है और न अस्पताल की एम्बुलेंस।
ग्रामीणों ने पंचायत से लेकर जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों तक कई बार गुहार लगाई, प्रस्ताव भेजे और ज्ञापन सौंपे, लेकिन उन्हें अब तक सिर्फ आश्वासन ही मिले हैं। सरपंच कुंवरसिंह मेरावी बताते हैं कि सड़क अच्छी बनी है, पर पुल के बिना वह अधूरी है। बैगा समुदाय की आंखों में आज भी वही सवाल तैरता है, क्या विकास केवल काग़ज़ों और तस्वीरों तक सीमित रहेगा, या कभी सचमुच उनके गांव तक पहुंचेगा?

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