उज्जैन: आमतौर पर भगवान श्रीकृष्ण की पूजा राधा के साथ होती है, लेकिन उज्जैन से करीब 32 किमी दूर स्थित नारायणा धाम मंदिर की पहचान ही अलग है।यहां भगवान श्रीकृष्ण के साथ उनकी बाल सखा सुदामा की पूजा होती है। मान्यता है कि इसी स्थान पर कृष्ण और सुदामा ने साथ में वन से लकड़ियां इकट्ठी की थीं।आज भी मंदिर परिसर में दोनों की लकड़ियों की गठरियों से जुड़े दिव्य वृक्ष मौजूद हैं, जिन्हें भक्त आस्था के साथ नमन करते हैं।
श्रीकृष्ण-सुदामा की मित्रता का एक महत्वपूर्ण प्रसंग
मान्यता है कि नारायणा धाम वही स्थान है, जहां से कृष्ण-सुदामा की मित्रता का एक महत्वपूर्ण प्रसंग जुड़ा है। भागवत परंपरा में वर्णित कथा के अनुसार, कंस वध के बाद श्रीकृष्ण, बलराम और सुदामा उज्जैन के सांदीपनि आश्रम में गुरु सांदीपनि से शिक्षा ले रहे थे
गुरुमाता ने दिए थे दो मुट्ठी चने
कथा के अनुसार, कृष्ण और सुदामा लकड़ियां लेने जंगल की ओर निकले। गुरुमाता ने रास्ते में खाने के लिए दोनों को दो मुट्ठी चने भी दिए थे। लकड़ियां इकट्ठी करते-करते शाम हो गई। इसी दौरान अचानक तेज बारिश शुरू हो गई।बारिश से बचने के लिए दोनों ने लकड़ियों के गट्ठर एक पेड़ के नीचे रख दिए। कथा के अनुसार श्रीकृष्ण पेड़ पर चढ़ गए और सुदामा नीचे रह गए। रात में भूख लगने पर सुदामा ने कृष्ण के हिस्से के चने भी खा लिए। श्रीकृष्ण ने आवाज सुनकर पूछा तो सुदामा ने चने खाने की बात छिपा दी।
यहां आज भी लकड़ियों की गठरी से जुड़े दो वृक्ष हैं मौजूद
नारायणा धाम मंदिर में आज भी श्रीकृष्ण और सुदामा की लकड़ियों की गठरी से जुड़े दो वृक्ष मंदिर के दोनों ओर दिखाई देते हैं। श्रद्धालु इन्हें भगवान कृष्ण और सुदामा की मित्रता से जुड़ी निशानी मानते हैं और इनका पूजन करते हैं।स्थानीय मान्यता के अनुसार, इन वृक्षों पर आज भी हरे पत्ते आते हैं। इसी कारण यहां आने वाले भक्तों के लिए यह स्थान विशेष आस्था का केंद्र है।

