महाकाल धाम के गर्भगृह में VIP एंट्री पर सुप्रीम कोर्ट ने अपना रुख किया स्पष्ट

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उज्जैन। विश्व प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग उज्जैन स्थित महाकालेश्वर मंदिर के गर्भगृह में VIP प्रवेश के खिलाफ दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से इनकार कर दिया है। अदालत ने याचिकाकर्ता को सलाह दी है कि वह अपनी मांग और आपत्ति मंदिर प्रशासन और संबंधित अधिकारियों के समक्ष रखे, क्योंकि यह विषय प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र से जुड़ा है।

सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि– “महाकाल के सामने कोई भी VIP नहीं होता।” अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि गर्भगृह में प्रवेश से जुड़े नियम तय करना न्यायालय का काम नहीं है। यह जिम्मेदारी मंदिर प्रशासन की है और अदालतें इस तरह के मामलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकतीं।

अदालतों का हस्तक्षेप क्यों जरूरी नहीं?

मामले पर शीर्ष अदालत का मानना है कि मंदिरों की आंतरिक व्यवस्था, सुरक्षा, भीड़ नियंत्रण और दर्शन प्रणाली से जुड़े फैसले प्रशासनिक विवेक पर आधारित होते हैं। ऐसे में किसे गर्भगृह में जाने की अनुमति दी जाए, इसका निर्णय मंदिर प्रबंधन, जिला प्रशासन और संबंधित अधिकारियों द्वारा लिया जाना चाहिए।

हाई कोर्ट पहले ही दे चुका है फैसला

इस मामले में इससे पहले अगस्त 2025 में मध्यप्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर बेंच भी याचिका खारिज कर चुकी है। हाई कोर्ट ने कहा था कि- गर्भगृह में प्रवेश को लेकर नीति तय करने का अधिकार उज्जैन जिला कलेक्टर और महाकाल मंदिर प्रशासक को है और अदालत इसमें दखल नहीं दे सकती।

याचिकाकर्ता का क्या कहना है?

याचिकाकर्ता का तर्क है कि दर्शन के दौरान VIP को विशेष सुविधा देना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता के अधिकार) का उल्लंघन है। उनका कहना है कि मंदिर में आने वाले सभी श्रद्धालु समान हैं और किसी को भी विशेष दर्जा नहीं मिलना चाहिए। हालांकि, आरोप लगाए जाते रहे हैं कि गर्भगृह आम लोगों के लिए बंद होने के बावजूद कुछ खास व्यक्तियों को नियमों से हटकर VIP प्रवेश दिया जाता है, जिससे असंतोष बढ़ा है और यह याचिका दायर की गई।

आगे क्या होगा?

सुप्रीम कोर्ट के इस रुख के बाद अब यह मामला पूरी तरह मंदिर प्रशासन और जिला प्रशासन के निर्णय पर निर्भर करता है। यदि प्रशासन चाहे तो दर्शन व्यवस्था में पारदर्शिता और समानता सुनिश्चित करने के लिए नए दिशा-निर्देश जारी कर सकता है।

 

 

 

 

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