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यूजीसी नियम 2026 पर घमासान, बीजेपी कार्यकर्ताओं के इस्तीफे, कुमार विश्वास का ‘मैं अभागा सवर्ण हूं’ पोस्ट

नई दिल्ली। यूजीसी के नए नियम 2026 को लेकर देशभर में विरोध तेज होता जा रहा है। भाजपा के कई पदाधिकारियों ने इस्तीफा दे दिया है, वहीं कवि कुमार विश्वास ने सोशल मीडिया पर तीखी टिप्पणी कर नियमों को वापस लेने की मांग की है। मामले ने राजनीतिक और सामाजिक बहस को और धार दे दी है।
यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (यूजीसी) के नियम 2026 को लेकर देश में विरोध के स्वर लगातार मुखर हो रहे हैं। लखनऊ में भाजपा के मंडल महामंत्री समेत 11 पदाधिकारियों ने पार्टी पदों से इस्तीफा दे दिया, जबकि लखीमपुर खीरी में भी कई कार्यकर्ताओं ने सामूहिक त्यागपत्र देकर फैसले पर पुनर्विचार की मांग की। कार्यकर्ताओं का कहना है कि नए नियमों से सामान्य वर्ग के छात्रों के हित प्रभावित होंगे और उच्च शिक्षा में उनके अवसर सीमित हो सकते हैं।
पूर्व मंडल अध्यक्ष और उपाध्यक्ष ने अपने पत्र में आरोप लगाया कि सरकार ने सामान्य वर्ग के साथ विश्वासघात किया है और समाज को बांटने वाला कदम उठाया है। उन्होंने कहा कि इससे हिंदू समाज में वर्ग संघर्ष की स्थिति बन सकती है और पार्टी अपने “एकता” के सिद्धांत से भटक रही है।
इसी बीच, प्रसिद्ध कवि और वक्ता कुमार विश्वास ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर दिवंगत कवि रमेश रंजन मिश्रा की कविता साझा करते हुए लिखा-“मैं अभागा सवर्ण हूं, मेरा रौंया-रौंया उखाड़ लो राजा।” उन्होंने हैशटैग ’यूजीसी रोलबैक ’’ का इस्तेमाल करते हुए नई गाइडलाइंस को वापस लेने की मांग की। कुमार विश्वास का यह बयान सोशल मीडिया पर व्यापक चर्चा का विषय बन गया है।
विवाद की जड़ 13 जनवरी 2026 को प्रकाशित यूजीसी के वे नियम हैं, जिनमें उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव रोकने के लिए विशेष समितियों, हेल्पलाइन और निगरानी तंत्र की अनिवार्यता तय की गई है, ताकि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और ओबीसी छात्रों की शिकायतों का समाधान किया जा सके। विरोध करने वालों का तर्क है कि इससे सामाजिक संतुलन प्रभावित होगा।
उधर, बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने भी इन नियमों का विरोध करते हुए इस्तीफा दिया था, जिसके बाद उन्हें अनुशासनहीनता के आरोप में निलंबित कर दिया गया। सरकार ने मामले की विभागीय जांच के आदेश दिए हैं। कुल मिलाकर, यूजीसी नियम 2026 अब शिक्षा नीति से आगे बढ़कर राजनीतिक और सामाजिक बहस का केंद्र बन चुके हैं।

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