मप्र में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) विधेयक को राज्यपाल मंगुभाई पटेल की मंजूरी मिल गई है। विधानसभा से पारित विधेयक अब राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेजा जाएगा। राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और लिव-इन संबंधों जैसे नागरिक मामलों में प्रदेश में समान कानूनी व्यवस्था लागू होने का रास्ता साफ हो जाएगा। प्रस्तावित प्रावधानों में बहुविवाह और निकाह हलाला पर रोक तथा लिव-इन संबंधों के पंजीयन की व्यवस्था भी शामिल है। यूसीसी का मूल उद्देश्य अलग-अलग समुदायों के लिए अलग व्यक्तिगत कानूनों के स्थान पर नागरिक मामलों में समान कानूनी व्यवस्था स्थापित करना है। इसे किसी एक धर्म के खिलाफ कानून के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।
हालांकि, कानून की स्वीकार्यता इस बात पर काफी हद तक निर्भर करेगी कि समानता के साथ धार्मिक स्वतंत्रता और संविधान प्रदत्त अधिकारों का संतुलन किस तरह कायम किया जाता है। मुस्लिम समाज के कुछ वर्ग यूसीसी का विरोध कर रहे हैं। उनकी मुख्य चिंता व्यक्तिगत कानून और धार्मिक परंपराओं में संभावित हस्तक्षेप को लेकर है। विवाह, तलाक और उत्तराधिकार जैसे विषय धार्मिक मान्यताओं से भी जुड़े हुए हैं। ऐसे में यूसीसी के प्रावधानों को लेकर उठ रही आशंकाओं को नजरअंदाज करने के बजाय उन पर गंभीर संवाद की जरूरत है। साथ ही यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि क्या हर धार्मिक परंपरा को केवल धार्मिक मान्यता के आधार पर कानूनी संरक्षण मिलना चाहिए। यदि कोई प्रथा लैंगिक समानता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता या नागरिक अधिकारों के संवैधानिक सिद्धांतों से टकराती है, तो उसमें सुधार पर चर्चा जरूरी है। लेकिन सुधार के नाम पर किसी समुदाय की वैध धार्मिक स्वतंत्रता प्रभावित न हो, यह सुनिश्चित करना भी सरकार की जिम्मेदारी है।
यही कारण है कि यूसीसी के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल कानून लागू करने की नहीं, बल्कि भरोसा कायम करने की है। सरकार को विभिन्न समुदायों की आपत्तियों और आशंकाओं को सुनना होगा। विवादित प्रावधानों की स्पष्ट व्याख्या करनी होगी और यह भरोसा दिलाना होगा कि कानून का उद्देश्य किसी धर्म की पहचान या धार्मिक मान्यताओं को बदलना नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों में समानता स्थापित करना है। समान नागरिक संहिता की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होगी कि एक कानून सभी नागरिकों पर लागू हो गया। इसकी असली कसौटी यह होगी कि इससे समान न्याय, समान अधिकार और संवैधानिक स्वतंत्रता कितनी प्रभावी ढंग से सुनिश्चित होती है। इसलिए यूसीसी पर बहस को धर्म बनाम कानून के विवाद तक सीमित करने के बजाय संविधान, समानता और व्यक्तिगत अधिकारों के व्यापक संदर्भ में आगे बढ़ाना चाहिए। कौन-सी परंपरा संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप है और किन प्रथाओं में सुधार की जरूरत है, इस पर खुले और लोकतांत्रिक संवाद से ही व्यापक सहमति बनाई जा सकती है।
-मिलिंद ठाकरे

