मप्र के अतिथि विद्वान नौकरी की स्थिरता मांग रहे हैं। वे नियमितीकरण चाहते हैं, ‘फॉलन आउट’ व्यवस्था से मुक्ति चाहते हैं और वर्षों से कॉलेजों में सेवाएं देने के बाद अपने भविष्य की गारंटी पूछ रहे हैं। लेकिन यदि इस सवाल का जवाब उन्हें चुनाव लड़ने की चुनौती के रूप में मिलता है, तो यह सिर्फ एक बयान नहीं, बल्कि शासन और शिक्षक के बीच संवाद की शैली पर बड़ा सवाल है। करीब 200 अतिथि विद्वान उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार के भोपाल स्थित आवास के बाहर प्रदर्शन करने पहुंचे। उनकी मांगें रोजगार और सेवा सुरक्षा से जुड़ी हैं। वे किसी राजनीतिक पद की मांग नहीं कर रहे थे, बल्कि अपनी नौकरी और भविष्य को लेकर सरकार से स्पष्ट नीति चाहते थे।
अतिथि विद्वानों का आरोप है कि बातचीत के दौरान उन्हें चुनाव लड़ने की चुनौती दी गई। अगर ऐसा कहा गया, तो सवाल स्वाभाविक है-नौकरी मांगने वाले शिक्षक से चुनाव लड़ने को कहना क्या उसकी समस्या का समाधान है? सरकार के पास नीति बनाने की ताकत है। वह तय कर सकती है कि अतिथि विद्वानों की मांगों में क्या संभव है और क्या नहीं। वह नियमों की बाध्यता बता सकती है। वह समयसीमा तय कर सकती है। लेकिन अगर रोजगार का सवाल राजनीतिक चुनौती में बदल जाए, तो इससे समस्या हल होने के बजाय टकराव और गहरा सकता है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या एक शिक्षक को अपनी नौकरी की सुरक्षा के लिए चुनावी मैदान में उतरना पड़ेगा? अतिथि विद्वानों ने ‘विद्वान जनता पार्टी’ बनाकर चुनावी राजनीति में जाने का फैसला किया है।
चुनाव लड़ना उनका लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन इस फैसले के पीछे उठ रहा सवाल शिक्षा व्यवस्था के लिए कहीं ज्यादा गंभीर है। यदि वर्षों से कॉलेजों में पढ़ा रहे शिक्षक यह महसूस करने लगें कि अपनी सेवा और भविष्य की लड़ाई उन्हें राजनीतिक मंच से लड़नी होगी, तो फिर सरकार की शिक्षा नीति और रोजगार व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है। शिक्षक का काम विद्यार्थियों को पढ़ाना है। सरकार का काम ऐसी व्यवस्था बनाना है जिसमें शिक्षक अपनी ऊर्जा पढ़ाने में लगाए, न कि हर सत्र में अपनी नौकरी बचाने की चिंता में।
अगर अतिथि विद्वान लगातार असुरक्षा में रहेंगे, तो इसका असर केवल उनके परिवारों पर नहीं, शिक्षा की गुणवत्ता और विद्यार्थियों की पढ़ाई पर भी पड़ सकता है। यहां सवाल यह नहीं है कि अतिथि विद्वानों की हर मांग सही है या सरकार को हर मांग मान लेनी चाहिए। सवाल यह है कि मांग सही नहीं है तो सरकार कारण बताए, रास्ता नहीं है तो विकल्प बताए और समाधान संभव है तो समयसीमा बताए। लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछने वाले नागरिक को चुनाव लड़ने की चुनौती देना आसान हो सकता है, लेकिन शासन की जिम्मेदारी सवाल को चुनाव में बदलना नहीं, समाधान में बदलना है।
आखिर शिक्षक से यह क्यों कहा जाए कि ‘नौकरी चाहिए तो चुनाव लड़ो’? क्या सरकार के पास नियमितीकरण, सेवा सुरक्षा और ‘फॉलन आउट’ जैसी समस्याओं पर कोई स्पष्ट नीति नहीं है? क्या वर्षों से पढ़ा रहे अतिथि विद्वानों के भविष्य का सवाल केवल आंदोलन और चुनावी राजनीति के बीच झूलता रहेगा? शिक्षक राजनीति में जाएं या न जाएं, यह उनका अधिकार और व्यक्तिगत निर्णय है। लेकिन ऐसी व्यवस्था लोकतंत्र और शिक्षा-दोनों के लिए बेहतर होगी, जिसमें शिक्षक को अपनी नौकरी बचाने के लिए चुनाव लड़ने की जरूरत महसूस न हो। क्योंकि सवाल चुनाव का नहीं है। सवाल उस व्यवस्था का है, जहां नौकरी मांगने वाला शिक्षक जवाब में नौकरी की नीति नहीं, चुनाव की चुनौती सुनने को मजबूर हो रहा है।
-मिलिंद ठाकरे

