कभी फिल्म नायक में एक दिन के मुख्यमंत्री का किरदार निभाते हुए हीरो को अचानक जनता के बीच जाकर व्यवस्था सुधारते देखा था। महेश्वर में गुरुवार को कुछ वैसा ही दृश्य हकीकत में नजर आया, जब मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने तय कार्यक्रम बदला और सीधे कतरगांव गेहूं उपार्जन केंद्र पहुंच गए। हेलीपैड की ओर बढ़ता काफिला अचानक मुड़ा और कुछ ही देर में मुख्यमंत्री किसानों के बीच थे—बिना सूचना, बिना औपचारिकता। यह दृश्य न केवल चौंकाने वाला था, बल्कि एक मजबूत संदेश भी देता है कि, सरकार अब केवल कागजों और बैठकों तक सीमित नहीं रहना चाहती। किसानों से सीधे सवाल, भुगतान समय पर हो रहा है या नहीं? और तौल में गड़बड़ी तो नहीं?, यह संवाद उस भरोसे को मजबूत करता है, जिसकी आज सबसे ज्यादा जरूरत है। जनता अपने मुख्यमंत्री को इसी अंदाज में देखना चाहती, जो कभी-कभार अचानक उसकी सुध लेने के लिए उसके पास पहुंचे। दिलचस्प यह है कि, यह अंदाज हमें रियासतों के उस दौर की भी याद दिलाता है, जब राजा-महाराज वेश बदलकर प्रजा का हाल जानने निकलते थे। फर्क बस इतना है कि अब वेश बदलने की जरूरत नहीं, बल्कि नीयत और सक्रियता ही सबसे बड़ा संदेश बनकर सामने आती है। हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम को केवल ‘नायक स्टाइल’ मान लेना सतही होगा। असली सवाल यह है कि क्या इस तरह के औचक निरीक्षण व्यवस्था में स्थायी बदलाव ला पाएंगे? क्या किसानों को हर बार राहत के लिए ऐसे ही किसी ‘ड्रामेटिक एंट्री’ का इंतजार करना पड़ेगा? मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को छाया, पानी और बैठने जैसी बुनियादी सुविधाएं सुनिश्चित करने के निर्देश दिए, यह जरूरी कदम है। लेकिन इससे भी ज्यादा जरूरी है कि ये व्यवस्थाएं मुख्यमंत्री के निरीक्षण की मोहताज नहीं, बल्कि सिस्टम का स्थायी हिस्सा बनें। निस्संदेह, ऐसे कदम प्रशासन में सतर्कता और जवाबदेही बढ़ाते हैं। यह संदेश साफ है कि अब जिम्मेदार अफसरानों और प्रशासन की लापरवाही छिप नहीं सकेगी। ‘नायक’ वाला यह दृश्य प्रेरक जरूर है, लेकिन लोकतंत्र की असली ताकत किसी एक दिन के नायकत्व में नहीं, बल्कि हर दिन बेहतर काम करने वाली मजबूत व्यवस्था में होती है। अगर यह पहल उस दिशा में ठोस बदलाव की शुरुआत बनती है, तभी यह ‘सीन’ सच मायनों में सफल कहा जाएगा।
-मिलिंद ठाकरे

