भोपाल की पहचान कभी सुकून और व्यवस्थित शहर के रूप में होती थी, लेकिन अब राजधानी की सड़कें जाम, अव्यवस्थित पार्किंग और बदहाल यातायात व्यवस्था की तस्वीर पेश करती हैं। सवाल यह है कि आखिर इस स्थिति के लिए जिम्मेदार कौन है? क्या केवल नियम तोड़ने वाले वाहन चालक, या फिर वे सरकारी एजेंसियां भी, जिन्होंने शहर के विकास की योजना तो बनाई, लेकिन यातायात की जरूरतों को नजरअंदाज कर दिया? अरेरा हिल्स इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
प्रदेश के सबसे बड़े प्रशासनिक केंद्र में रोज हजारों लोग आते हैं, लेकिन पार्किंग क्षमता जरूरत के मुकाबले बेहद कम है। परिणाम यह कि सड़कें ही पार्किंग स्थल बन जाती हैं और पूरा इलाका जाम की गिरफ्त में आ जाता है। यही हाल पुराने सचिवालय, एमपी नगर, न्यू मार्केट और प्रमुख अस्पतालों के आसपास भी दिखाई देता है। ऐसे में केवल चालान काटना समाधान नहीं हो सकता, क्योंकि जब पार्किंग का विकल्प ही नहीं होगा, तो वाहन सड़क पर ही खड़े होंगे। असल समस्या शहर नियोजन की है।
सरकारी कार्यालय, व्यावसायिक परिसर और बड़े संस्थान तो बनते गए, लेकिन उनके अनुरूप पार्किंग, वैकल्पिक मार्ग और सार्वजनिक परिवहन का विस्तार नहीं हुआ। नगर निगम, टाउन एंड कंट्री प्लानिंग, लोक निर्माण विभाग और ट्रैफिक पुलिस के बीच समन्वित योजना का अभाव आज साफ दिखाई देता है। हर विभाग अपनी जिम्मेदारी सीमित दायरे में निभा रहा है, जबकि यातायात जैसी समस्या साझा सोच और संयुक्त कार्रवाई की मांग करती है। यह भी सच है कि नागरिकों की जिम्मेदारी कम नहीं है। गलत पार्किंग, अतिक्रमण, फुटपाथों पर कब्जा और यातायात नियमों की अनदेखी भी अव्यवस्था को बढ़ाती है। लेकिन व्यवस्था की कमियों का बोझ केवल आम लोगों पर नहीं डाला जा सकता।
भोपाल को अब तात्कालिक नहीं, बल्कि दीर्घकालिक समाधान चाहिए। मल्टीलेवल और अंडरग्राउंड पार्किंग, प्रभावी सार्वजनिक परिवहन, वैज्ञानिक ट्रैफिक प्लानिंग और एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय समय की मांग है। राजधानी की सड़कें तभी व्यवस्थित होंगी, जब विकास योजनाओं में यातायात को प्राथमिकता दी जाएगी। आखिर किसी भी आधुनिक शहर की पहचान केवल नई इमारतों से नहीं, बल्कि सुगम और अनुशासित यातायात व्यवस्था से होती है। भोपाल को भी अब इसी कसौटी पर खुद को साबित करना होगा।
-मिलिंद ठाकरे

