मप्र में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) अब कानून का विषय नहीं रह गया है। यह धर्म, धार्मिक स्वतंत्रता, समानता और नागरिक अधिकारों के बीच खड़ी एक ऐसी बहस बन गई है, जिसमें भावनाएं भी हैं और संविधान की कसौटी भी। विधानसभा से यूसीसी विधेयक पारित होने के बाद मुस्लिम संगठनों की आपत्तियां सामने आना स्वाभाविक है। उनका तर्क है कि इससे शरीयत और धार्मिक स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। दूसरी ओर सरकार इसे सभी नागरिकों के लिए समान अधिकार और समान कानून की दिशा में बड़ा कदम बता रही है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या समान नागरिक संहिता को केवल इसलिए इस्लाम विरोधी मान लिया जाए क्योंकि उसके कुछ प्रावधान मुस्लिम व्यक्तिगत कानूनों से अलग हैं? और क्या धार्मिक व्यक्तिगत कानून को संविधान की कसौटी से बाहर रखा जा सकता है? मुस्लिम समाज की आशंकाओं को महज विरोध या राजनीति कहकर खारिज करना भी उतना ही गलत होगा। विवाह, तलाक, विरासत और परिवार से जुड़े कानून किसी भी समुदाय की सामाजिक संरचना और धार्मिक भावनाओं से जुड़े होते हैं। इसलिए लोकतंत्र में कानून बनाने की प्रक्रिया संवाद से चलनी चाहिए, टकराव से नहीं।
मध्यप्रदेश में यूसीसी का प्रारूप तैयार करने वाली समिति ने विभिन्न वर्गों और धार्मिक प्रतिनिधियों से सुझाव लिए हैं, लेकिन अब सरकार की जिम्मेदारी है कि उठाए गए सवालों का स्पष्ट और तर्कसंगत जवाब भी दे। इसके साथ ही मूल सवाल से बचा नहीं जा सकता-क्या किसी धर्म का व्यक्तिगत कानून संविधान से ऊपर हो सकता है? भारत का संविधान धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है, लेकिन यह स्वतंत्रता कानून, सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और अन्य संवैधानिक अधिकारों के अधीन है। धर्म का सम्मान लोकतंत्र की खूबसूरती है, लेकिन नागरिकों के अधिकारों और न्याय के प्रश्न पर अंतिम कसौटी संविधान ही होना चाहिए। यूसीसी के समर्थकों का तर्क है कि विवाह, तलाक, उत्तराधिकार जैसे नागरिक मामलों में समानता जरूरी है।
मध्यप्रदेश के कानून में बहुविवाह पर रोक, विवाह का पंजीकरण और पुरुषों-महिलाओं को समान उत्तराधिकार अधिकार जैसे प्रावधान हैं। लेकिन यहीं सरकार से एक असहज सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि, अगर कानून समान नागरिकता के सिद्धांत पर आधारित है तो अनुसूचित जनजातियों को इससे बाहर क्यों रखा गया है?
सरकार को इसका जवाब देना होगा। समानता का अर्थ हर व्यक्ति और हर परिस्थिति पर आंख मूंदकर एक ही प्रावधान थोप देना नहीं है। संविधान तर्कसंगत वर्गीकरण की अनुमति देता है। इसलिए आदिवासी समुदायों को दी गई छूट का संवैधानिक, सामाजिक और व्यावहारिक आधार सार्वजनिक होना चाहिए। समानता के नाम पर कानून बनाया जा रहा है तो उसके अपवाद भी उतने ही पारदर्शी होने चाहिए। मुस्लिम समाज को भी यह समझना होगा कि संविधान उनकी धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करता है, लेकिन वही संविधान सभी नागरिकों को समानता का अधिकार भी देता है। धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक समानता एक-दूसरे की दुश्मन नहीं हैं। असली चुनौती दोनों के बीच संतुलन कायम करने की है। सरकार की जिम्मेदारी इससे कम नहीं है। उसे यह साबित करना होगा कि यूसीसी किसी धर्म को कमजोर करने या निशाना बनाने का औजार नहीं है।
कानून की भाषा निष्पक्ष हो, प्रावधान भेदभावरहित हों और उसका क्रियान्वयन भी बिना धार्मिक पूर्वाग्रह के हो। किसी कानून की विश्वसनीयता उसके नाम से नहीं, उसके न्यायपूर्ण आचरण से तय होती है।
इसलिए बहस यह नहीं होनी चाहिए कि यूसीसी के पक्ष में कौन है और विरोध में कौन। असली सवाल यह है कि क्या यह कानून न्याय को मजबूत करेगा? क्या महिलाओं और पुरुषों को समान अधिकार देगा? क्या नागरिक स्वतंत्रता सुरक्षित रहेगी? क्या धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक समानता के बीच उचित संतुलन बनेगा? भारत में न धर्म संविधान से ऊपर है और न सरकार संविधान से ऊपर।
यही इस पूरी बहस की सबसे बड़ी और सबसे कठोर सच्चाई है। यूसीसी की असली परीक्षा यह नहीं है कि वह कितना धार्मिक है या कितना धर्मनिरपेक्ष दिखता है। उसकी असली परीक्षा यह है कि वह कितना संवैधानिक, न्यायपूर्ण, समान और निष्पक्ष है। इसलिए बहस को धर्म बनाम कानून की खाई में धकेलने के बजाय संविधान की चौखट पर लाना होगा। यही लोकतंत्र की मर्यादा है और यही संविधान की सर्वोच्चता का वास्तविक अर्थ भी।
-मिलिंद ठाकरे

