नई दिल्ली: देशभर में लगातार सामने आ रहे पेपर लीक मामलों के बीच केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा की है कि अब पेपर लीक से जुड़े मामलों की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट्स (Fast Track Courts) में कराई जाएगी, ताकि दोषियों को जल्द से जल्द सख्त सजा मिल सके और युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वालों पर कड़ी कार्रवाई हो।
प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर कहा कि सरकार युवाओं के भविष्य की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है और परीक्षा प्रणाली को कमजोर करने वालों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा।

क्या होती हैं फास्ट ट्रैक कोर्ट्स?
फास्ट ट्रैक कोर्ट्स ऐसी विशेष अदालतें होती हैं, जिन्हें गंभीर और संवेदनशील मामलों की तेजी से सुनवाई के लिए बनाया गया है। इन अदालतों का उद्देश्य लंबित मामलों को कम समय में निपटाना और पीड़ितों को शीघ्र न्याय दिलाना है। इनकी शुरुआत वर्ष 2000 में 11वें वित्त आयोग की सिफारिश पर हुई थी। बाद में 14वें वित्त आयोग ने भी देशभर में बड़ी संख्या में फास्ट ट्रैक कोर्ट्स स्थापित करने की सिफारिश की। शुरुआत में इन अदालतों में हत्या, अपहरण, दुष्कर्म और अन्य गंभीर अपराधों की सुनवाई होती थी। बाद में POCSO और रेप मामलों के लिए Fast Track Special Courts (FTSC) बनाई गईं। अब सरकार ने पेपर लीक मामलों को भी इसी व्यवस्था के दायरे में लाने का निर्णय लिया है।
देश में कितनी हैं फास्ट ट्रैक कोर्ट्स?
कानून मंत्रालय द्वारा संसद में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, 31 जनवरी 2026 तक देश के 21 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 862 फास्ट ट्रैक कोर्ट्स कार्यरत थीं। उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक 373 फास्ट ट्रैक कोर्ट्स हैं। महाराष्ट्र दूसरे स्थान पर है, जहां 105 अदालतें संचालित हो रही हैं।
वहीं Fast Track Special Courts (FTSC) की संख्या 774 है, जिनमें से 398 अदालतें केवल POCSO मामलों की सुनवाई करती हैं। सबसे अधिक 218 FTSC उत्तर प्रदेश में हैं। मध्य प्रदेश में 67 FTSC संचालित हैं।
क्या वास्तव में जल्दी मिलता है इंसाफ?
फास्ट ट्रैक कोर्ट्स का उद्देश्य सामान्य अदालतों की तुलना में मामलों का तेज निपटारा करना है। सामान्य अदालतों में जहां कई मामलों में फैसला आने में वर्षों लग जाते हैं। वहीं फास्ट ट्रैक कोर्ट्स में अधिकांश मामलों का फैसला 6 महीने से 1 वर्ष के भीतर करने का लक्ष्य रखा जाता है। कानून मंत्रालय के अनुसार, 2023 से 2025 के बीच फास्ट ट्रैक कोर्ट्स ने 40.26 लाख मामलों का निपटारा किया। इसी अवधि में Fast Track Special Courts ने 2.28 लाख से अधिक मामलों का फैसला सुनाया।
96% मामलों का हुआ समय पर निपटारा
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2024 में रेप और POCSO मामलों की सुनवाई करने वाली FTSC में 96 प्रतिशत से अधिक मामलों का निपटारा हुआ। वर्ष 2024 में कुल 88,902 नए मामले दर्ज हुए। इनमें से 85,595 मामलों का उसी वर्ष निपटारा कर दिया गया। यानी इन अदालतों की कार्यक्षमता सामान्य अदालतों की तुलना में कहीं अधिक रही।
फिर भी क्यों होती है देरी?
हालांकि फास्ट ट्रैक कोर्ट्स को तेजी से सुनवाई के लिए बनाया गया है, लेकिन कई मामलों में देरी भी देखने को मिलती है। इसके पीछे कई कारण हैं—
- अदालतों में पर्याप्त आधारभूत सुविधाओं की कमी
- पुलिस जांच में देरी या खामियां
- फोरेंसिक रिपोर्ट समय पर न मिलना
- गवाहों और संबंधित पक्षों का सहयोग न मिलना
- जटिल कानूनी प्रक्रियाएं
इन्हीं कारणों से कुछ मामलों में तय समय से अधिक वक्त लग जाता है।
अब पेपर लीक मामलों पर क्या होगा असर?
सरकार का मानना है कि पेपर लीक जैसे मामलों की त्वरित सुनवाई से दोषियों को जल्द सजा मिलेगी, जिससे परीक्षा माफिया पर प्रभावी अंकुश लगेगा और प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता मजबूत होगी। यदि राज्यों में पर्याप्त संख्या में फास्ट ट्रैक कोर्ट्स और संसाधन उपलब्ध कराए गए, तो लाखों अभ्यर्थियों को समय पर न्याय मिलने की संभावना बढ़ेगी।

