भोपाल / किशन चौबे: 6 जुलाई को मनाए जाने वाले विश्व ग्रामीण विकास दिवस पर ग्रामीण क्षेत्रों के महत्व, गरीबी, कृषि, जलवायु परिवर्तन और समावेशी विकास की जरूरत पर जोर दिया गया।
हर साल 6 जुलाई को विश्व ग्रामीण विकास दिवस मनाया जाता है। इस दिन का उद्देश्य ग्रामीण समुदायों के महत्व को रेखांकित करना और उन्हें विकास की मुख्यधारा से जोड़ने के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। यह दिवस 1979 में एशिया और प्रशांत क्षेत्र के लिए ग्रामीण विकास केंद्र (सीआईआरडीएपी) की स्थापना की याद भी दिलाता है।
दुनिया की लगभग 80 प्रतिशत गरीब आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है, जहां आज भी स्वास्थ्य, शिक्षा और बुनियादी सुविधाओं की कमी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) के अनुसार, बहुआयामी गरीबी का सबसे अधिक प्रभाव ग्रामीण इलाकों में देखने को मिलता है।
ग्रामीण क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था का आधार कृषि है। दुनिया के लगभग 80 प्रतिशत भोजन का उत्पादन छोटे और पारिवारिक किसान करते हैं। इसके बावजूद किसानों को आधुनिक तकनीक, सिंचाई, बाजार और उचित मूल्य जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। ग्रामीण महिलाएं भी कृषि क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, लेकिन उन्हें भूमि, ऋण और अन्य संसाधनों तक अपेक्षाकृत कम पहुंच मिलती है।
जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा असर भी ग्रामीण क्षेत्रों पर पड़ रहा है। सूखा, बाढ़ और अत्यधिक गर्मी जैसी घटनाएं खेती और आजीविका दोनों को प्रभावित कर रही हैं। इसके अलावा ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच डिजिटल सुविधाओं की असमानता भी विकास की गति को प्रभावित कर रही है।
भारत में भी ग्रामीण क्षेत्र देश की अर्थव्यवस्था की मजबूत नींव हैं। कृषि, छोटे उद्योग और श्रम आधारित रोजगार गांवों की आर्थिक गतिविधियों का प्रमुख आधार हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, डिजिटल कनेक्टिविटी और रोजगार के अवसर बढ़ाकर ही गरीबी, असमानता और जलवायु संबंधी चुनौतियों का प्रभावी समाधान किया जा सकता है।
विश्व ग्रामीण विकास दिवस इस बात की याद दिलाता है कि सतत विकास, खाद्य सुरक्षा और आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था का रास्ता मजबूत और समृद्ध गांवों से होकर गुजरता है।

