नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित ‘इंडिया AI इम्पैक्ट समिट 2026’ के दौरान हुए विरोध-प्रदर्शन को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। भारतीय युवा कांग्रेस के कुछ कार्यकर्ताओं द्वारा कार्यक्रम स्थल के अंदर किए गए प्रदर्शन पर 270 पूर्व न्यायाधीशों और वरिष्ठ अधिकारियों ने संयुक्त पत्र जारी कर कड़ी आपत्ति जताई है। यह समिट वैश्विक स्तर के टेक्नोलॉजी विशेषज्ञों, नीति-निर्माताओं और कई देशों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में आयोजित की गई थी। इसी दौरान कुछ कार्यकर्ताओं ने कथित तौर पर शर्ट उतारकर नारेबाज़ी की, जिसकी तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गए।
राष्ट्रीय गरिमा के खिलाफ कदम
बता दें पूर्व न्यायाधीशों और अधिकारियों ने ‘A National Disgrace at Bharat Mandapam’ शीर्षक से जारी बयान में कहा कि- इस तरह का प्रदर्शन केवल किसी सरकार के खिलाफ विरोध नहीं, बल्कि देश की अंतरराष्ट्रीय साख को प्रभावित करने वाला कदम है। दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश एस. एन. ढिंगरा और पूर्व पुलिस महानिदेशक बी. एल. वोहरा ने बयान में कहा कि- अंतरराष्ट्रीय मंच पर इस तरह की गतिविधि भारत की संस्थागत विश्वसनीयता और मेजबानी की गरिमा पर प्रश्नचिह्न लगाती है। पत्र में दावा किया गया कि प्रदर्शन करने वाले लोग वैध क्यूआर कोड पास के जरिए कार्यक्रम स्थल में दाखिल हुए और फिर योजनाबद्ध तरीके से विरोध किया।
निवेश और टेक्नोलॉजी सेक्टर पर असर की आशंका
बयान में यह भी कहा गया कि ऐसे घटनाक्रम विदेशी निवेशकों और टेक्नोलॉजी साझेदारों के बीच गलत संदेश भेज सकते हैं। जब देश एआई और उभरती तकनीकों में अपनी प्रगति को प्रदर्शित कर रहा हो, तब इस प्रकार का व्यवधान भारत की ‘इनोवेशन-फ्रेंडली’ छवि को नुकसान पहुंचा सकता है। पत्र में उल्लेख किया गया कि यह घटना उन वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और स्टार्टअप उद्यमियों के प्रयासों को भी कमतर आंकती है, जो भारत को टेक्नोलॉजी हब के रूप में स्थापित करने में लगे हैं।
लोकतांत्रिक विरोध बनाम वैश्विक मंच
साथ ही पूर्व अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि लोकतांत्रिक विरोध नागरिकों का मौलिक अधिकार है, लेकिन उसका तरीका जिम्मेदार और गरिमापूर्ण होना चाहिए। उनके मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों को घरेलू राजनीतिक टकराव का मंच नहीं बनाया जाना चाहिए। उन्होंने राजनीतिक दलों से अपील की कि वैश्विक कार्यक्रमों को पक्षपातपूर्ण टकराव से दूर रखा जाए और असहमति को संसदीय बहस तथा संस्थागत संवाद के माध्यम से व्यक्त किया जाए।


