भोपाल: बागसेवनिया थाना क्षेत्र में पांचवीं कक्षा के छात्र की कथित पिटाई की घटना ने शिक्षक-शिष्य संबंध की उस बुनियादी कसौटी पर सवाल खड़ा किया है, जिस पर शिक्षा की पूरी व्यवस्था टिकी है। बच्चे की मां ने कोचिंग शिक्षक के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है और बच्चे के गाल तथा कान पर चोट के निशान मिलने की बात सामने आई है। आरोपों की पुष्टि जांच के बाद होगी, लेकिन सवाल अभी से सामने है-क्या अनुशासन के नाम पर बच्चे पर हाथ उठाने की गुंजाइश अब भी बची है?
शिक्षक की डांट और सख्ती शिक्षा का हिस्सा हो सकती है, लेकिन हिंसा को अनुशासन का पर्याय नहीं बनाया जा सकता। बच्चा होमवर्क नहीं करता, गलती करता है या पढ़ाई में लापरवाही बरतता है तो शिक्षक का काम उसे समझाना, उसकी जिम्मेदारी तय करना और उसे बेहतर करने के लिए प्रेरित करना है। हाथ उठाना सबसे आसान रास्ता हो सकता है, लेकिन यह शिक्षा का रास्ता नहीं है। कुछ दशक पहले शिक्षक की डांट को विद्यार्थी और अभिभावक सहजता से स्वीकार करते थे। इसके पीछे केवल शिक्षक का सम्मान नहीं, बल्कि गहरा विश्वास था।
अभिभावकों को भरोसा था कि शिक्षक की सख्ती बच्चे के हित में है। आज शिक्षा का स्वरूप बदल चुका है। स्कूलों के साथ कोचिंग संस्थानों की भूमिका बढ़ी है और शिक्षक-विद्यार्थी संबंध भी अधिक औपचारिक हुए हैं। ऐसे में पुराने तौर-तरीकों को उसी रूप में स्वीकार करने की अपेक्षा भी उचित नहीं। असल चुनौती अनुशासन खत्म करना नहीं, अनुशासन की भाषा बदलना है। बच्चे को गलती की कीमत समझनी चाहिए, लेकिन सुधार का रास्ता भय और चोट से होकर नहीं गुजरना चाहिए। जिस शिक्षा के केंद्र में बच्चे की सुरक्षा, गरिमा और व्यक्तित्व निर्माण होना चाहिए, वहां हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं हो सकता। गुरु का सम्मान उसके अधिकार से नहीं, उसके आचरण से बनता है। शिक्षक वह नहीं जो बच्चे को अपने हाथ से नियंत्रित करे, बल्कि वह है जो अपने ज्ञान और व्यवहार से उसे सही रास्ते पर चलने की क्षमता दे।
शिक्षा में अनुशासन जरूरी है, कठोरता भी अपनी जगह हो सकती है। लेकिन हिंसा को अनुशासन का नाम देना शिक्षक और शिक्षा दोनों की गरिमा को कम करता है।
-मिलिंद ठाकरे

