कैंसर का इलाज महंगा है, यह बात अब इतनी सामान्य हो चुकी है कि मानो मरीज के लिए लूट की कोई गुंजाइश ही न बची हो। लेकिन जब एक कैंसर दवा सरकार को करीब 333 रुपये में मिल सकती है और उसी दवा की एमआरपी 10 हजार से 12,500 रुपये तक पहुंच जाती है, तो इसे महज महंगाई कहना सच से आंख चुराना होगा। बीमारी मरीज को मारती है, मगर दवा की कीमत उसके परिवार को आर्थिक रूप से तोड़ देती है। सवाल यह है कि जीवन बचाने वाली दवा मरीज तक पहुंचते-पहुंचते इतनी महंगी कैसे हो जाती है? पैक्लिटैक्सेल 260 एमजी की कीमत में करीब 30 से 38 गुना तक का यह अंतर केवल आंकड़ा नहीं है। इसके पीछे वह व्यवस्था दिखाई देती है, जिसमें दवा की वास्तविक लागत, सरकारी खरीद मूल्य, कारोबारी मार्जिन और मरीज से वसूली जाने वाली कीमत के बीच एक गहरी खाई है।
डोसेटैक्सेल 120 एमजी के मामले में भी सरकारी खरीद दर करीब 369 रुपये है, जबकि कुछ ब्रांडों की एमआरपी 13,500 रुपये तक पहुंचती है। अगर बड़ी मात्रा में खरीद कीमत घटा सकती है, तो सवाल यह है कि खुदरा बाजार में मरीज को उसका लाभ क्यों नहीं मिलता? यहां तर्क दिया जा सकता है कि सरकारी खरीद और खुदरा बिक्री की परिस्थितियां अलग होती हैं। बेशक, वितरण, भंडारण, कर, ब्रांडिंग और कारोबार की लागत होती है। लेकिन क्या ये सभी लागतें मिलकर कीमत को कई गुना बढ़ाने को उचित ठहरा सकती हैं? और अगर नहीं, तो उस अतिरिक्त रकम का हिसाब कौन देगा? कैंसर से जूझ रहे परिवार के लिए यह कोई सैद्धांतिक बहस नहीं है। हर इंजेक्शन, हर चक्र और हर पर्ची के साथ खर्च बढ़ता जाता है। मरीज के पास न दवा टालने का विकल्प है, न बीमारी के साथ मोलभाव करने का। ऐसी स्थिति में कीमतों की अपारदर्शिता सीधे उसकी मजबूरी का फायदा उठाने की स्थिति पैदा करती है। नेशनल फार्मास्यूटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी ने 42 नॉन-शेड्यूल्ड कैंसर दवाओं पर ट्रेड मार्जिन की अधिकतम सीमा 30 प्रतिशत तय की है और इससे 500 से अधिक ब्रांडों की कीमतों में कमी भी आई। यह कदम स्वागतयोग्य है, लेकिन सवाल यह है कि कैंसर की बाकी दवाओं के मामले में क्या मरीज को बाजार की शर्तों पर छोड़ देना उचित है?
दवा बाजार में एक ही औषधीय घटक अलग-अलग कंपनियों के अलग-अलग ब्रांड नामों से बिकता है और उनकी कीमतों में बड़ा अंतर हो सकता है। मरीज को अपनी जेब से चुकाई गई रकम तो पता होती है, लेकिन अस्पताल या मेडिकल स्टोर ने दवा कितने में खरीदी, यह जानने का अधिकार और साधन उसके पास नहीं होता। यही सूचना का असंतुलन उस व्यवस्था को जन्म देता है जिसमें मरीज सबसे कमजोर पक्ष बन जाता है। नेशनल कैंसर ग्रिड के तहत सामूहिक खरीद का अनुभव इस तर्क को भी कमजोर करता है कि कैंसर की दवाएं स्वाभाविक रूप से इतनी महंगी ही होनी चाहिए। 23 अस्पतालों के लिए 40 प्रमुख कैंसर दवाओं की सामूहिक खरीद में कंपनियों से एमआरपी पर औसतन 82 प्रतिशत तक की छूट मिली। यानी कीमत घटाना संभव है। सवाल केवल यह है कि वह कमी मरीज तक क्यों नहीं पहुंचती? सुप्रीम कोर्ट द्वारा दवाओं की कीमतों और अस्पतालों के मार्जिन पर सवाल उठाया जाना इसी वजह से महत्वपूर्ण है। स्वास्थ्य सेवा में पारदर्शिता कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं, बुनियादी आवश्यकता है। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि दवा की वास्तविक खरीद कीमत, वितरक और अस्पताल का मार्जिन तथा मरीज से वसूली जाने वाली अंतिम कीमत साफ-साफ सामने आए। कैंसर मरीज से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह बीमारी से लड़ने के साथ-साथ दवा बाजार की पेचीदगियों से भी लड़े। जिस दवा का उद्देश्य जीवन बचाना है, अगर उसकी कीमत ही मरीज को कर्ज, संपत्ति बेचने और आर्थिक तबाही की ओर धकेल दे, तो सवाल केवल दवा के दाम का नहीं रह जाता-सवाल यह होता है कि हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था आखिर किसके लिए काम कर रही है।
-मिलिंद ठाकरे

