सरकारी नौकरी में मनमानी नहीं, जवाबदेही चलनी चाहिए। जब सरकारी आदेशों की अनदेखी होने लगे और उसका खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़े, तो सख्ती जरूरी हो जाती है। छिंदवाड़ा में स्वामित्व योजना के काम में कथित लापरवाही को लेकर 11 नियमित पटवारियों के निलंबन और 32 प्रोविजनल पटवारियों के खिलाफ बर्खास्तगी की कार्रवाई ने राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल खड़ा किया है। सवाल सीधा है-जब सरकारी आदेश का पालन ही नहीं होगा, तो व्यवस्था कैसे चलेगी?
जमीन से जुड़े कामों के लिए आम आदमी को पटवारी के दफ्तर के चक्कर काटने पड़ते हैं। नामांतरण, सीमांकन और राजस्व रिकॉर्ड में सुधार जैसे कामों में देरी लोगों की परेशानी बढ़ाती है। ऐसे में सरकारी योजना का काम प्रभावित करना जनता के हितों के साथ खिलवाड़ है। सरकारी कर्मचारी का दायित्व व्यवस्था को सुचारु बनाना है, न कि अपनी शर्तों पर चलाना।पटवारियों का तर्क है कि स्वामित्व योजना के तहत संपत्ति संबंधी दस्तावेजों में निष्पादक बनाए जाने से उन्हें भविष्य में कानूनी जोखिम उठाना पड़ सकता है। यदि उनकी आशंकाएं वाजिब हैं, तो सरकार को नियम स्पष्ट कर समाधान निकालना चाहिए। लेकिन आपत्ति के नाम पर सरकारी काम रोकना उचित नहीं है। विरोध के लिए ज्ञापन, बातचीत और न्यायिक प्रक्रिया के रास्ते खुले हैं। जनता को परेशानी में डालना किसी भी आंदोलन का औचित्य नहीं हो सकता। सरकारी वेतन जनता के कर से मिलता है, इसलिए जवाबदेही से बचने की छूट किसी को नहीं मिल सकती। स्वामित्व योजना ग्रामीण परिवारों को उनकी आबादी भूमि के संपत्ति संबंधी दस्तावेज उपलब्ध कराने की महत्वपूर्ण पहल है। ये दस्तावेज केवल कागज नहीं, बल्कि लोगों की संपत्ति के अधिकार और आर्थिक सुरक्षा से जुड़े हैं। कर्मचारियों के विवाद में योजना अटकती है, तो नुकसान उस ग्रामीण का होता है जो अपने अधिकारों के लिए सरकारी व्यवस्था पर भरोसा करता है। हालांकि, प्रशासन की सख्ती भी नियमों के दायरे में होनी चाहिए। निलंबन और बर्खास्तगी की कार्रवाई तथ्यों, साक्ष्यों और उचित सुनवाई के आधार पर होनी चाहिए। कर्मचारियों की वास्तविक समस्याओं को नजरअंदाज करना समाधान नहीं है, लेकिन उनकी आड़ में कामकाज बाधित करने की छूट भी नहीं दी जा सकती।
अब सरकार को स्पष्ट संदेश देना होगा-कर्मचारियों की जायज मांगों पर बातचीत होगी, लेकिन सरकारी आदेशों की अवहेलना और जनता के काम में बाधा बर्दाश्त नहीं की जाएगी।पटवारियों पर नकेल कसना किसी कर्मचारी-विरोधी अभियान का हिस्सा नहीं, बल्कि जनता के प्रति जवाबदेही सुनिश्चित करने की जरूरत है। राजस्व विभाग किसी की निजी जागीर नहीं है। यहां पहली प्राथमिकता जनता का काम होना चाहिए, कर्मचारियों की मनमर्जी नहीं।
-मिलिंद ठाकरे

