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संपादकीय: फर्जी डिग्री पर 17 साल नौकरी, जवाबदेही किसकी?

मप्र के स्वास्थ्य विभाग में एक डॉक्टर की शैक्षणिक योग्यता को लेकर सामने आया है। मामला सरकारी नियुक्तियों की जांच और प्रशासनिक निगरानी की पोल खोलता है। बालाघाट जिले के बिरसा ब्लॉक के प्रभारी खंड चिकित्सा अधिकारी डॉ. सुनील कुमार सिंह के खिलाफ कथित फर्जी दस्तावेजों के आधार पर सरकारी नौकरी हासिल करने के आरोप में प्राथमिकी दर्ज की गई है। आरोप है कि उन्होंने दूसरे डॉक्टर के दस्तावेजों के सहारे नौकरी प्राप्त की और करीब 17 साल तक सरकारी सेवा में बने रहे। यदि ये आरोप सही साबित होते हैं, तो यह केवल एक व्यक्ति का फर्जीवाड़ा नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की गंभीर विफलता होगी, जो नियुक्ति से लेकर पदोन्नति तक हर स्तर पर दस्तावेजों की प्रामाणिकता सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदार है।

इस मामले का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि जिन दस्तावेजों को करीब दो साल पहले जांच के बाद सही बताया गया था, उन्हीं पर अब सवाल उठ रहे हैं। बताया जाता है कि तत्कालीन मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. मनोज पांडे ने 5 जून 2024 को जारी पत्र में श्याम शाह मेडिकल कॉलेज और अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय, रीवा से प्राप्त सत्यापन के आधार पर डॉ. सिंह की एमबीबीएस डिग्री और अंकसूची को वैध माना था। कॉलेज के अभिलेखों में 27 दिसंबर 2000 को एमबीबीएस में प्रवेश और इंटर्नशिप पूरी करने का उल्लेख था। विश्वविद्यालय से अंतिम परीक्षा के अनुक्रमांक और प्रायोगिक परीक्षा के अंकों की जानकारी भी प्राप्त हुई थी। इसके बाद दस्तावेजों को सही मान लिया गया। सवाल है कि जब संबंधित संस्थानों से सत्यापन कराया गया था, तो अब कथित फर्जीवाड़े के आरोप कैसे सामने आए? क्या सत्यापन के दौरान दस्तावेजों का पर्याप्त मिलान नहीं हुआ था? क्या किसी दूसरे डॉक्टर के शैक्षणिक अभिलेखों का इस्तेमाल कर इस प्रक्रिया को प्रभावित किया गया? या फिर पहले की जांच में ऐसी किसी विसंगति पर ध्यान ही नहीं दिया गया? इन सवालों के जवाब सामने आए बिना पूरे मामले की तह तक पहुंचना संभव नहीं है।

स्वास्थ्य विभाग जैसे संवेदनशील महकमे में ऐसी चूक को सामान्य प्रशासनिक गलती मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यहां नियुक्त अधिकारी की शैक्षणिक योग्यता केवल एक प्रमाणपत्र का विषय नहीं है, बल्कि उसके पेशेवर ज्ञान, प्रशिक्षण और जिम्मेदारियों से जुड़ी होती है। डॉक्टरों की नियुक्ति में सत्यापन की प्रक्रिया जितनी मजबूत होनी चाहिए, उतनी ही जवाबदेह उसकी निगरानी भी होनी चाहिए। यदि किसी अधिकारी ने कथित तौर पर गलत दस्तावेजों के आधार पर नौकरी हासिल की और वर्षों तक विभाग को इसकी भनक नहीं लगी, तो यह जानना भी जरूरी है कि नियुक्ति से लेकर पदोन्नति तक की प्रक्रिया में किन अधिकारियों ने क्या भूमिका निभाई।
बिरसा ब्लॉक पहले ही आदिवासी बच्चों की मौत के मामले को लेकर चर्चा में रहा है। ऐसे क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवाओं की जिम्मेदारी संभालने वाले अधिकारी की शैक्षणिक योग्यता पर सवाल उठना और भी गंभीर है। दूरस्थ और आदिवासी अंचलों में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, विशेषज्ञ डॉक्टरों के रिक्त पद और सीमित संसाधन पहले से ही बड़ी चुनौती हैं। ऐसे में नियुक्तियों की पारदर्शिता और चिकित्सकीय सेवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करना विभाग की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए। सरकार को इस मामले की निष्पक्ष और समयबद्ध जांच करानी चाहिए। डॉ. सिंह की नियुक्ति, डिग्री सत्यापन, सेवा अभिलेख और पदोन्नति से संबंधित सभी दस्तावेजों की पड़ताल होनी चाहिए। वर्ष 2024 में जारी सत्यापन पत्र के आधार और अब सामने आए आरोपों के बीच के अंतर को स्पष्ट किया जाना चाहिए। संबंधित शैक्षणिक संस्थानों के मूल अभिलेखों से दस्तावेजों का दोबारा मिलान कराया जाए और यह भी पता लगाया जाए कि पहले की जांच में कोई चूक हुई थी या नहीं। यदि किसी स्तर पर लापरवाही, मिलीभगत या जानबूझकर अनदेखी के प्रमाण मिलते हैं, तो संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। इस मामले की जांच केवल एक अधिकारी तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं होगा। स्वास्थ्य विभाग में डॉक्टरों की शैक्षणिक योग्यता के सत्यापन की पूरी व्यवस्था की समीक्षा की जानी चाहिए। यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि कहीं दूसरे मामलों में भी गलत प्रमाणपत्रों के आधार पर नियुक्तियां तो नहीं हुई हैं। तकनीक और डिजिटल अभिलेखों के इस दौर में सत्यापन की ऐसी व्यवस्था विकसित की जा सकती है, जिसमें संबंधित विश्वविद्यालय और मेडिकल कॉलेज के मूल रिकॉर्ड से प्रमाणपत्रों का मिलान हो और प्रत्येक स्तर पर जांच का स्पष्ट रिकॉर्ड सुरक्षित रहे।

सरकारी नौकरी में फर्जीवाड़े का आरोप जितना गंभीर है, उतना ही गंभीर सवाल उस व्यवस्था की जवाबदेही का भी है, जो वर्षों तक इसकी पहचान नहीं कर सकी। आरोपों की पुष्टि न्यायिक प्रक्रिया में होनी है, लेकिन जांच में सामने आए विरोधाभासों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यदि दस्तावेज फर्जी पाए जाते हैं, तो दोषी के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। साथ ही, जिन अधिकारियों ने सत्यापन किया, नियुक्ति दी और पदोन्नति की प्रक्रिया पूरी की, उनकी भूमिका की भी जांच होनी चाहिए। आखिर सरकारी व्यवस्था में जवाबदेही केवल उस व्यक्ति की क्यों हो, जिस पर फर्जीवाड़े का आरोप है? उस तंत्र की जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए, जिसकी निगरानी में कथित गड़बड़ी वर्षों तक बनी रही। सवाल सिर्फ यह नहीं कि फर्जी डिग्री पर 17 साल नौकरी कैसे चली, सवाल यह भी है कि विभाग की जांच और निगरानी व्यवस्था आखिर इतने लंबे समय तक सोती क्यों रही?

-मिलिंद ठाकरे

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