किरनापुर/बालाघाट: किरनापुर में लगभग 35 लाख रुपये की लागत से बने पंचायत भवन में गड़बड़ी का मामला गरमाता जा रहा है। किरनापुर जनपद पंचायत के ग्राम पंचायत देवगांव में अनियमितताओं की जांच के बाद रिकवरी के आदेश तो दे दिए गए हैं, लेकिन सीएम हेल्पलाइन की शिकायतें बंद होने से प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
35 लाख का भवन, लेकिन हिसाब-किताब पर सवाल!
सवाल यह है कि, देवगांव में लगभग 35 लाख रुपये की भवन निर्माण पर खर्च हुई राशि का पूरा हिसाब सार्वजनिक क्यों नहीं किया जाता? निर्माण कार्य की तकनीकी जांच में क्या सामने आया? भुगतान किन दस्तावेजों के आधार पर किए गए? और यदि अनियमितताएं पाई गई हैं, तो उनकी पूरी जिम्मेदारी किसकी है?
रिकवरी का आदेश आया, तो बाकी कार्रवाई कहां अटकी?
शिकायतकर्ता का कहना है कि अगर रिकवरी का आदेश जारी हुआ है, तो प्रशासन साफ करे कि कितनी राशि की वसूली तय की गई और अब तक क्या कार्रवाई हुई?
चार शिकायतें बंद, लेकिन सवाल अब भी जिंदा
देवगांव पंचायत मामले में अब सीएम हेल्पलाइन की शिकायतें बंद होने पर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। शिकायतकर्ता का गंभीर आरोप है कि बिना संतोषजनक निराकरण के चारों शिकायतें बंद कर दी गईं।
सवाल यह है कि शिकायतों को किस आधार पर बंद किया गया और जांच रिपोर्ट क्या कहती है? क्या प्रशासन का मकसद समस्याओं का समाधान करना है या सिर्फ पोर्टल पर शिकायतों का स्टेटस बदलना? शिकायतकर्ता ने अब इन सभी बिंदुओं पर उच्चस्तरीय समीक्षा और निष्पक्ष कार्रवाई की मांग की है।
CEO ममता कुलस्ते से सवाल—जवाबदेही आखिर किसकी?
देवगांव पंचायत मामले में अब किरनापुर जनपद पंचायत की CEO ममता कुलस्ते की भूमिका और जवाबदेही पर सीधे सवाल उठ रहे हैं।
शिकायतकर्ता का दावा है कि जब उसने CEO से शिकायतें बंद होने का कारण पूछा, तो उन्हें सिर्फ यह कह दिया गया कि पोर्टल पर जानकारी दर्ज कर निराकरण कर दिया गया है। शिकायतकर्ता ने अब जमीनी हकीकत और दस्तावेजों के आधार पर निष्पक्ष कार्रवाई की मांग उठाई है।
जांच अधिकारी भगवान सैय्याम और वैनेश्वर बिसन की भूमिका पर भी उठे सवाल
शिकायतकर्ता ने जांच अधिकारी भगवान सैय्या और वैंनेश्वर बिसन पर निष्पक्ष जांच न करने के आरोप लगाए हैं। मांग उठाई गई है कि जांच रिपोर्ट की स्वतंत्र समीक्षा हो और यह स्पष्ट किया जाए कि निर्माण कार्यों का भौतिक सत्यापन और दस्तावेजों की पड़ताल किस आधार पर की गई?
शिकायतकर्ता का कहना है कि अगर जांच में किसी भी अधिकारी की लापरवाही पाई जाती है, तो उनके खिलाफ सख्त नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।
शिकायतकर्ता पर दबाव का आरोप, प्रशासन करे जांच
शिकायतकर्ता ने यह भी आरोप लगाया है कि मामले को आगे नहीं बढ़ाने के लिए उस पर दबाव बनाया जा रहा है। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।प्रशासन को शिकायतकर्ता के आरोपों की जांच करानी चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी भी व्यक्ति को शिकायत दर्ज कराने या भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच की मांग करने के कारण अनुचित दबाव का सामना न करना पड़े।
अब प्रशासन से सीधे सवाल
लगभग 35 लाख रुपये के पंचायत भवन निर्माण की पूरी तकनीकी जांच रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं की जाती?
सरपंच लक्ष्मण बेले और सचिव ढेकवार की भूमिका की जांच कब पूरी होगी?मुख्यमंत्री हेल्पलाइन की चार शिकायतें किस आधार पर बंद की गईं?जांच अधिकारी श्याम और बिसन की रिपोर्ट की स्वतंत्र समीक्षा होगी या नहीं?
शिकायत में उठाए गए बाकी बिंदुओं पर कार्रवाई कब होगी?
क्या जिला प्रशासन पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराकर जिम्मेदारी निर्धारित करेगा?
सबसे बड़ा सवाल—जांच पूरी होगी या मामला फाइलों में ही उलझा रहेगा?
देवगांव पंचायत भवन का मामला अब केवल एक शिकायत तक सीमित नहीं है। यह सरकारी धन के उपयोग, जांच प्रक्रिया की पारदर्शिता और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा सवाल है।
यदि आरोप निराधार हैं, तो प्रशासन को दस्तावेजों और जांच रिपोर्ट के आधार पर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। यदि अनियमितताएं प्रमाणित होती हैं, तो जिम्मेदार व्यक्तियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।जनता के पैसों का हिसाब मांगना कोई अपराध नहीं है। असली सवाल यह है कि लगभग 35 लाख रुपये के पंचायत भवन पर उठे सवालों का पूरा और पारदर्शी जवाब कब मिलेगा?


