ग्वालियर में हाल ही में जूना अखाड़ा के पीठाधीश्वर यति नरसिंहानंद गिरी द्वारा दिया गया बयान एक बार फिर देश में इतिहास, विचारधारा और राजनीति के टकराव को सामने ले आया है। उन्होंने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को लेकर बेहद तीखी टिप्पणी की और नाथूराम गोडसे को बलिदानी बताते हुए उनके कृत्य को वध कहा। इतना ही नहीं, उन्होंने विनायक दामोदर सावरकर के विचारों से दूरी बनाने को लेकर भाजपा की आलोचना भी की। ऐसे बयान न केवल राजनीतिक बहस को गरमाते हैं, बल्कि समाज में वैचारिक विभाजन को भी गहरा करते हैं।
भारत का इतिहास जटिल और बहुआयामी रहा है। स्वतंत्रता आंदोलन में कई विचारधाराएं सक्रिय थीं-अहिंसा का मार्ग, क्रांतिकारी रास्ता और राष्ट्रवाद की अलग-अलग धाराएं। महात्मा गांधी ने अहिंसा और सत्याग्रह के जरिए स्वतंत्रता आंदोलन को जनांदोलन बनाया। वहीं सावरकर और अन्य राष्ट्रवादी नेताओं की अपनी विचारधाराएं थीं, जिनका एक अलग प्रभाव रहा। लेकिन इतिहास के इन अध्यायों को वर्तमान राजनीति की जहरीली भाषा में पेश करना अक्सर समाज को ध्रुवीकरण की ओर ले जाता है।
यति नरसिंहानंद गिरी का बयान इस बात की ओर भी संकेत करता है कि देश में अतीत के प्रतीकों को लेकर संघर्ष अभी समाप्त नहीं हुआ है। कुछ समूह गोडसे को एक विचारधारा के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जबकि देश का बड़ा वर्ग उन्हें उस व्यक्ति के रूप में देखता है जिसने राष्ट्रपिता की हत्या की। यही कारण है कि इस तरह के बयान तुरंत राष्ट्रीय बहस का विषय बन जाते हैं।
दूसरी ओर, उन्होंने भारतीय जनता पार्टी पर जो आरोप लगाए कि, पार्टी सावरकर के विचारों से दूरी बनाकर गद्दारी कर रही है, वह भी राजनीतिक विमर्श का हिस्सा है। भारतीय राजनीति में विचारधाराओं का उपयोग अक्सर परिस्थितियों और रणनीतियों के अनुसार होता है। लेकिन जब धार्मिक या ऐतिहासिक प्रतीकों को लेकर विवादित भाषा का प्रयोग होता है, तो इसका असर केवल राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समाज की सामूहिक मानसिकता पर भी पड़ता है। लोकतंत्र में विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है, परंतु यह भी उतना ही जरूरी है कि सार्वजनिक जीवन में जिम्मेदारी और संतुलन बना रहे। इतिहास के व्यक्तित्वों पर बहस हो सकती है, आलोचना भी हो सकती है, लेकिन ऐसी भाषा और प्रतीकात्मकता से बचना चाहिए जो समाज में तनाव और विभाजन को बढ़ाए। आज जरूरत इस बात की है कि इतिहास को समझने की बहस तथ्यों, शोध और संवाद के आधार पर हो, न कि उत्तेजक नारों और विवादित टिप्पणियों के सहारे। क्योंकि जब इतिहास राजनीति का हथियार बन जाता है, तो उसका असर केवल अतीत की व्याख्या तक सीमित नहीं रहता। वह वर्तमान और भविष्य दोनों को प्रभावित करता है।
-मिलिंद ठाकरे

