राजनीति में कई बार ऐसा होता है कि जो आवाज जनता के दर्द को शब्द देती है, वही सत्ता और संगठन की असहजता का कारण बन जाती है। गुना विधायक पन्नालाल शाक्य के हालिया बयान और उसके बाद भाजपा जिला संगठन की सक्रियता को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। सवाल यह नहीं है कि विधायक ने क्या कहा, बल्कि यह है कि उन्होंने वह कहा क्यों? जब पूरा क्षेत्र घंटों की बिजली कटौती से जूझ रहा हो, जब आम नागरिक, व्यापारी, किसान और छात्र विद्युत अव्यवस्था से परेशान हों, तब एक जनप्रतिनिधि यदि जनता की पीड़ा को मुखर करता है तो क्या वह अनुशासनहीनता कहलाएगी या जनप्रतिनिधित्व का धर्म?
विधायक ने ऊर्जा व्यवस्था, मंत्री की चुप्पी और प्रशासनिक उदासीनता पर सवाल उठाए। उनकी भाषा भले ही पारंपरिक राजनीतिक शब्दकोश की न रही हो, किंतु उनकी शैली सदैव स्पष्टवादिता और जनभाषा की रही है। कबीर अंदाज में कही गई कटु बात भी कभी-कभी समाज को आईना दिखाने का काम करती है। ऐसे में उनके वक्तव्य को ‘रस्सी को सांप’ बनाकर प्रस्तुत करना राजनीतिक दूरदर्शिता नहीं, बल्कि संगठनात्मक अधीरता प्रतीत होती है। यदि वास्तव में अनुशासनात्मक कार्रवाई की आवश्यकता महसूस हुई थी तो क्या जिला कार्यकारिणी की बैठक हुई? क्या गुण-दोष पर विचार हुआ? क्या लोकतांत्रिक प्रक्रिया का पालन किया गया? यदि नहीं, तो यह प्रश्न स्वाभाविक है कि कार्रवाई संगठनात्मक विवेक से प्रेरित है या व्यक्तिगत आग्रह से।
आज जनता का बड़ा वर्ग बिजली संकट को लेकर आक्रोशित है। वह यह भी जानना चाहता है कि समस्या के समाधान पर चर्चा हो या समस्या उठाने वालों को कठघरे में खड़ा किया जाए। राजनीति में संगठन महत्वपूर्ण है, लेकिन संगठन का उद्देश्य जनभावनाओं को दबाना नहीं, उन्हें दिशा देना होता है। आखिरकार लोकतंत्र में सबसे बड़ा निर्णायक मतदाता होता है। यदि जनता विधायक की बात में अपना दर्द देख रही है, तो संगठन को आत्ममंथन करना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि जनता के सवालों से मुंह मोड़ने की कीमत भविष्य की राजनीति को चुकानी पड़े। क्योंकि इतिहास गवाह है कि, जनता की आवाज़ को अनुशासन के नाम पर दबाया जा सकता है, पर पराजित नहीं किया जा सकता।
-मिलिंद ठाकरे

