इंदौर का प्रतिष्ठित डेली कॉलेज इंदौर इन दिनों शिक्षा से ज्यादा राजनीति के केंद्र में खड़ा नजर आ रहा है। भाजपा के प्रस्तावित प्रशिक्षण वर्ग ने जिस तरह विवाद को जन्म दिया है, उसने एक बड़े और गंभीर प्रश्न को सामने ला दिया है कि, क्या देश के ऐतिहासिक शैक्षणिक संस्थान अब राजनीतिक प्रयोगशालाएं बनते जा रहे हैं? पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का विरोध केवल एक आयोजन तक सीमित नहीं है, बल्कि वह उस ‘ट्रेंड’ की ओर इशारा करता है, जो धीरे-धीरे संस्थानों की निष्पक्षता को कमजोर कर रहा है। उनका यह कहना कि डेली कॉलेज जैसी 140 साल पुरानी संस्था किसी एक विचारधारा का मंच नहीं बन सकती, सिर्फ राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि संस्थागत गरिमा की चिंता भी है।
यहां मुद्दा भाजपा या कांग्रेस का नहीं है, बल्कि उस संतुलन का है, जो लोकतंत्र में बेहद जरूरी होता है। यदि शिक्षण संस्थानों के दरवाजे राजनीतिक आयोजनों के लिए खुलते हैं, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या भविष्य में हर दल इसी रास्ते पर नहीं चलेगा? और अगर ऐसा हुआ, तो शिक्षा के ये केंद्र कहीं ‘निष्पक्ष ज्ञान’ की जगह ‘विचारधारा के प्रचार’ का माध्यम तो नहीं बन जाएंगे? इतिहास गवाह है कि शिक्षा संस्थान समाज के बौद्धिक विकास के केंद्र होते हैं, न कि राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन के मंच। भाजपा का प्रशिक्षण वर्ग अपने आप में गलत नहीं है, लेकिन उसका स्थान और संदर्भ बेहद महत्वपूर्ण है। दिग्विजय सिंह द्वारा उठाए गए सवाल, कि किसकी अनुमति से परिसर दिया गया, क्या बोर्ड को जानकारी थी, ये केवल औपचारिक प्रश्न नहीं, बल्कि पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग हैं। आखिरकार, यह विवाद हमें एक बड़े सच की याद दिलाता है। संस्थानों की साख एक बार गिर जाए, तो उसे दोबारा खड़ा करना बेहद कठिन होता है। डेली कॉलेज को ‘सियासी अखाड़ा’ बनने से बचाना सिर्फ प्रबंधन की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज की साझा चिंता होनी चाहिए।
-मिलिंद ठाकरे


