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प्रशासनिक तानाशाही के विरुद्ध कर्मचारियों की बड़ी जीत; बैकफुट पर आए जिला पंचायत सीईओ, वेतन कटौती का आदेश निरस्त

बालाघाट। जिला पंचायत में लंबे समय से सुलग रहा प्रशासनिक असंतोष अब एक बड़े आंदोलन में तब्दील हो गया है। पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के अधिकारी-कर्मचारियों की सामूहिक एकजुटता और तीखे विरोध के आगे झुकते हुए जिला पंचायत सीईओ अभिषेक सर्राफ को अपना विवादित फैसला वापस लेना पड़ा है। सीईओ ने मनरेगा और अन्य योजनाओं की प्रगति के आधार पर जारी किए गए वेतन कटौती के आदेशों को तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया है।
लामबंद कर्मचारियों के आंदोलन ने बढ़ाया दबाव
विवाद की शुरुआत तब हुई जब जिले भर के पंचायत कर्मी सीईओ की कार्यप्रणाली के खिलाफ एकजुट होकर कलेक्ट्रेट पहुंचे। कर्मचारियों ने कलेक्टर को सौंपे ज्ञापन में सीईओ पर मानसिक उत्पीड़न और अलोकतांत्रिक दबाव’ के गंभीर आरोप लगाए। स्थिति तब और तनावपूर्ण हो गई जब कर्मचारी संगठनों ने स्पष्ट कर दिया कि यदि उनकी मांगें नहीं मानी गईं, तो वे 28 फरवरी से सामूहिक अवकाश और 2 मार्च से अनिश्चितकालीन हड़ताल’’ पर चले जाएंगे।
ऐसे उपजा विवाद और भड़का आक्रोश
कर्मचारियों ने अपनी शिकायतों में सीईओ की कार्यशैली के कई पहलुओं को उजागर किया है।
अनुचित कार्य समय- शाम 6 बजे से रात 9 बजे तक चलने वाली वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग ने कर्मचारियों के निजी जीवन में असंतुलन पैदा किया, जो महिला कर्मचारियों के लिए विशेष रूप से असुरक्षित और असुविधाजनक साबित हुआ।
अभद्र व्यवहार- बैठकों के दौरान कथित तौर पर अमर्यादित भाषा का प्रयोग और अपमानजनक रवैया।
वेतन कटौती- योजनाओं की प्रगति को आधार बनाकर बिना किसी ठोस प्रक्रिया के वेतन रोकना या काटना।
प्रशासनिक दबाव-सीएम हेल्पलाइन प्रकरणों को जबरन ’फोर्स क्लोज’ करने और स्थानांतरण संबंधी नियमों की अनदेखी का आरोप।
वेतन जारी का हुआ नया आदेश
27 फरवरी को हुए अधिकारी-कर्मचारी आंदोलन के व्यापक असर को देखते हुए जिला पंचायत सीईओ ने अब नरमी दिखाई। एक बीघा मां के नाम’ अभियान के दौरान रोकी गई वेतन वृद्धि और काटी गई राशि के आहरण के लिए नए आदेश जारी कर दिए गए हैं। कर्मचारी संयुक्त मोर्चा ने इसे अपनी एकजुटता की जीत बताया है।
जीत के बावजूद संशय बरकरार
भले ही वेतन कटौती और आर्थिक मांगें मान ली गई हों, लेकिन कर्मचारियों का रोष पूरी तरह शांत नहीं हुआ है। संगठन का कहना है कि वेतन बहाली महज एक तात्कालिक राहत है, जबकि मूल समस्या दुर्व्यवहार और कार्य संस्कृति की है। कर्मचारी अब भी सीईओ को हटाए जाने की मांग पर अड़े हुए हैं।
गतिरोध से विकास कार्य हो सकते हैं प्रभावित
यदि प्रशासन और कर्मचारियों के बीच यह गतिरोध पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ, तो जिले में मनरेगा, प्रधानमंत्री आवास योजना और अन्य विकास कार्य ठप हो सकते हैं। आगामी दिनों में यह देखना होगा कि शासन इस प्रशासनिक दरार को भरने के लिए क्या ठोस कदम उठाता है।

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2 COMMENTS

  1. मुलताई में कुछ बैंक, कुछ शॉपिंग कॉम्प्लेक्स बिना पार्किंग के संचालित हो रहे हैं, तथा कुछ लोगों ने पार्किंग के लिए जगह बहुत कम दी है। जो वाहन पार्किंग के लिए पर्याप्त नहीं है। इससे ग्राहको को वाहन खड़े करने में बहुत परेशानी होती है। आखिर बिना पार्किंग के बैंक कैसे संचालित हो रहे हैं। ये तो नियमों का उल्लघंन हो रहा है। सड़क किनारे वाहन खड़े करने से यातायात व्यवस्था प्रभावित होती है। कई बार दुर्घटना तक हो जाती है। सरकारी जमीन पर वाहन खड़े हो रहे हैं । जबकि जिस भवन मे बैंक संचालित होती है उसकी स्वयं की पार्किंग होना जरूरी है। मुलताई में संचालित सभी बैंकों की पार्किंग व्यवस्था की जांच होना चाहिए।
    कुछ बेसमेंट बिना अनुमति के बने हैं। कुछ व्यावसायिक भवनों के नक्शे बिना पार्किंग दिए पास हुए हैं। कुछ लोगों ने सरकारी जमीन पर पक्का अतिक्रमण कर लिया है। जांच होना चाहिए।
    नाम – रवि खवसे
    शहर – मुलताई
    जिला – बैतूल
    राज्य – मध्यप्रदेश

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