भोपाल: बाजारों में आग का खतरा मंडरा रहा है और जिम्मेदार महकमे शायद किसी बड़े हादसे के इंतजार में हैं। न्यू मार्केट की करीब नौ सौ दुकानों के बीच सुलगती भट्टियां, बिजली के असुरक्षित तार और अग्नि सुरक्षा के इंतजामों पर उठते सवाल व्यवस्था की गंभीर खामियों को उजागर करते हैं। आठ अक्टूबर को एक दुकान में लगी आग आसपास की दुकानों और रेहड़ियों तक फैल गई थी। यह घटना चेतावनी थी, लेकिन सवाल है कि क्या जिम्मेदारों ने इससे कोई सबक लिया? आखिर आग लगने के बाद ही प्रशासन की नींद क्यों खुलती है? राजधानी के बाजार केवल खरीदारी के केंद्र नहीं, हजारों लोगों की रोजी-रोटी के ठिकाने भी हैं। यहां हर दिन बड़ी संख्या में ग्राहक, व्यापारी और कर्मचारी पहुंचते हैं। ऐसे में अग्नि सुरक्षा की अनदेखी मामूली लापरवाही नहीं, बल्कि लोगों की जान और करोड़ों के कारोबार को जोखिम में डालने जैसा है। ज्वलनशील सामान के बीच भट्टियां जल रही हों, बिजली के तार असुरक्षित हों और आग बुझाने के उपकरणों की उपलब्धता या कार्यक्षमता संदिग्ध हो, तो किसी बड़ी त्रासदी की आशंका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
चिंता की बात यह है कि आग का यह खतरा न्यू मार्केट तक सीमित नहीं है। चौक बाजार और इब्राहिमपुरा जैसे पुराने शहर के संकरे इलाकों में अग्निशमन प्रणाली लगाने पर लाखों रुपये खर्च किए गए। इसके बावजूद जुलाई 2026 में आग की घटना के दौरान प्रणाली के काम नहीं करने की खबरें सामने आईं। बैरागढ़ में भीषण अग्निकांड के बाद लगाए गए उपकरणों के रखरखाव और नियमित परीक्षण पर भी सवाल उठते रहे हैं। इससे साफ है कि सरकारी धन खर्च कर उपकरण स्थापित कर देना और आपात स्थिति में उनका काम करना दो अलग-अलग बातें हैं।
यदि आग लगने पर पंप नहीं चलें, हाइड्रेंट में पानी न हो या दमकल को संकरी गलियों तक पहुंचने का रास्ता न मिले, तो कागजों पर दर्ज तैयारियों का कोई अर्थ नहीं रह जाता। आखिर अग्निशमन उपकरणों की नियमित जांच कौन करता है? उनकी कार्यक्षमता की आखिरी बार परीक्षा कब हुई? निरीक्षण में कमियां मिलने पर क्या कार्रवाई की गई? इन सवालों के जवाब जिम्मेदार विभागों को देने चाहिए। इस स्थिति के लिए केवल व्यापारियों को दोषी ठहराकर प्रशासन अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता। दुकानदारों का दायित्व है कि वे सुरक्षा नियमों का पालन करें, लेकिन निगरानी, नियमित निरीक्षण और उल्लंघन पर कार्रवाई करना संबंधित विभागों का काम है। यदि बाजारों में लंबे समय से खतरे मौजूद हैं, तो यह पूरे निगरानी तंत्र की जवाबदेही का मामला है।
अब नगर निगम और अग्निशमन विभाग को बाजारवार सुरक्षा ऑडिट कराना चाहिए। बिजली के तारों, भट्टियों, रसोईघरों, अग्निशामक यंत्रों, जलापूर्ति और दमकल के पहुंच मार्गों की जांच हो। दुकानदारों और कर्मचारियों को आग बुझाने का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाए। जहां खामियां मिलें, वहां सुधार की समयसीमा तय हो और नियम तोड़ने वालों पर कार्रवाई की जाए। निरीक्षण रिपोर्ट और सुधार की स्थिति सार्वजनिक हो, ताकि जवाबदेही सरकारी फाइलों तक सीमित न रहे। दुकानों को दूसरी जगह स्थानांतरित करने की योजना भी तभी कारगर होगी, जब व्यापारियों को व्यावहारिक विकल्प और स्पष्ट समयसीमा मिले। केवल स्थानांतरण की घोषणा से खतरा खत्म नहीं होगा। मौजूदा बाजारों को सुरक्षित बनाना और नए बाजारों में सुरक्षा मानकों का पालन कराना, दोनों प्रशासन की जिम्मेदारी हैं।
आग लगने के बाद मुआयना करना, जांच के आदेश देना और नुकसान का आकलन करना प्रशासनिक सक्रियता नहीं है। असली परीक्षा हादसे से पहले होती है। बाजारों में सुरक्षा की अनदेखी किसी दिन बड़ी त्रासदी में बदल गई, तो उसके बाद की कार्रवाई न जानें लौटा सकेगी, न उजड़ा कारोबार। भोपाल के बाजारों को आश्वासन नहीं, काम करने वाली अग्नि सुरक्षा व्यवस्था चाहिए। सवाल सिर्फ यह नहीं कि आग बुझाने के उपकरण लगे हैं या नहीं; सवाल यह है कि जरूरत पड़ने पर वे काम भी करेंगे या नहीं। प्रशासन को साबित करना होगा कि उसकी प्राथमिकता आग बुझाने की तैयारी दिखाना नहीं, बल्कि आग लगने की नौबत ही न आने देना है। क्योंकि हादसे के बाद जागने वाले महकमों के पास जांच और मुआवजे के लिए वक्त हो सकता है, लेकिन तब तक बहुत कुछ राख हो चुका होता है।
-मिलिंद ठाकरे

