वर्दी कानून की ताकत है, किसी की निजी ब्रांडिंग का माध्यम नहीं। जिस क्षण पुलिस की कार्रवाई कैमरे के सामने उपलब्धि और सोशल मीडिया पर व्यक्तिगत प्रचार का रूप लेने लगे, उसी क्षण सवाल खड़ा होता है कि पुलिस जनता की सेवा कर रही है या अपनी छवि चमका रही है? गिरफ्तारी हो, हथियारों की बरामदगी हो या किसी अपराध का खुलास-यह किसी एक पुलिसकर्मी की निजी सफलता नहीं, बल्कि सरकारी तंत्र की जिम्मेदारी और सामूहिक मेहनत का परिणाम है। इसलिए वर्दी में प्रचार की सीमा तय होना जरूरी है।
सोशल मीडिया ने पुलिस की कार्यशैली को जनता के सामने लाने का रास्ता आसान किया है, लेकिन यही सुविधा कई बार मर्यादा की परीक्षा भी बन जाती है। मप्र पुलिस मुख्यालय की 24 बिंदुओं वाली सोशल मीडिया गाइडलाइन इसी बदलते दौर में जरूरी हस्तक्षेप है। सवाल यह नहीं कि पुलिस अपनी उपलब्धियां क्यों बताए, सवाल यह है कि विभागीय सूचना कहां खत्म होती है और व्यक्तिगत प्रचार कहां शुरू होता है? सबसे गंभीर चिंता जांच और गोपनीयता की है। लंबित जांच पर सोशल मीडिया टिप्पणी उसकी दिशा प्रभावित कर सकती है। महिला, बालिका या किशोर पीड़ित की पहचान तस्वीर अथवा वीडियो से उजागर होना उसके जीवन पर स्थायी असर डाल सकता है। संवेदनशील ड्यूटी की लोकेशन, जियो-टैगिंग, जब्त सामग्री की तस्वीरें या जांच से जुड़ी सूचनाएं सार्वजनिक करना पुलिस की कार्यवाही को भी जोखिम में डाल सकता है। गाइडलाइन में शासन की नीतियों की सार्वजनिक आलोचना और विभागीय मामलों को सोशल मीडिया पर ले जाने पर रोक के प्रावधान हैं। यहां संतुलन जरूरी है।अनुशासन के नाम पर अभिव्यक्ति का गला न घुटे और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर विभागीय मर्यादा भी न टूटे। इसके लिए विभागीय शिकायत और संवाद की व्यवस्था प्रभावी होना आवश्यक है।
आखिर सवाल सीधा है-क्या वर्दी की पहचान वायरल तस्वीरों से होगी या निष्पक्ष कार्रवाई से?
वर्दी लाइक, कमेंट और फॉलोअर जुटाने के लिए नहीं है। वर्दी जनता का भरोसा जीतने के लिए है। पुलिस की असली ताकत सोशल मीडिया की चमक नहीं, बल्कि उसका संयम, निष्पक्षता और जवाबदेही है।
-मिलिंद ठाकरे

